झूठे स्व को छोड़ने के युग में
प्रकाशित अद्यतन
यह सामान्य बात है, कि लोगों से सम्मान पाने वाला व्यक्ति, स्वयं का सम्मान करते हुए जीता है, और लोगों से महत्व पाने वाला व्यक्ति भी, चुपचाप स्वयं को महत्व देते हुए जीता है।
ऐसे लोगों में, कुछ सचेत रूप से ऐसा करते हैं, और कुछ अनजाने में ऐसा करते हैं।
लेकिन दोनों ही तरह, स्वयं को महत्व देकर जीने में कोई अंतर नहीं।
यह न समझने वाले लोग ही, दूसरों से संबंधों में हीनभावना रखकर, असहज महसूस करते हैं।
जब तुम्हें लगे कि दूसरे तुम्हारा सम्मान नहीं करते, तुम्हें महत्व नहीं देते, तब शायद तुम स्वयं को क्षमा करना या स्वयं से प्रेम करना, थोड़ा भूल गए हो।
इसे, अपनी पवित्रता अभी याद न कर पाई अवस्था भी कह सकते हैं न।
पृथ्वी के बहुत से लोग, अनजाने में ख़ुद को नीचा देखते हुए जीते हैं।
यही मानवता की पवित्रता को ढकने वाली आत्म-सीमा और आत्म-नकार की वास्तविकता है।
“मैं कौन हूँ?” जैसा प्रश्न लगातार ख़ुद से पूछकर, उस प्रश्न के उत्तर (पहचान) की वास्तविक स्थिति को जीवन के सत्य के क़रीब लाते जाना अच्छा है, यह हमेशा कहते हैं न।
महत्व देने योग्य “मैं” आख़िर कौन है?
असली और नकली में अंतर कर सको, तो जीवन के प्रकाश को सही ढंग से प्रकट करके, भोलेपन से जीते जा सकते हो।
लेकिन, जो वह अंतर नहीं कर पाते, वे कर्म-चेतना के पूर्वाग्रहों, जल्दबाज़ी के फ़ैसलों, ज़िद और आसक्ति को पकड़कर, “यही मैं हूँ” मान बैठते हैं, इसलिए द्वैत के टकराव के संसार से आसानी से निकल नहीं पाते और पीड़ित रहते हैं।
कितना भी ऊँचा आदर्श लेकर जियो, आत्म-सम्मान से कितना भी कवच पहन लो, जब तक सच्चा स्व, वास्तविक स्व नहीं पकड़ते, मनुष्य पीड़ा के दलदल में बस इधर-उधर भटकता रहता है।

सच्चा स्व खोजो।
इसके लिए, जो वैसा नहीं उस स्व को छोड़कर फेंकने की ज़रूरत है।
कहाँ छोड़कर फेंकें?
यही हमेशा कहा जाने वाला, संरक्षक देवताओं और आत्माओं को सौंप देना है।
मैं, मेरा, मुझसे, मुझे……।
अब धीरे-धीरे, असली स्व न होने वाले पूर्वाग्रहों, जल्दबाज़ी के फ़ैसलों, ज़िद और आसक्ति को “मैं” मानना छोड़कर नहीं देखोगे?
हमेशा कहते हैं न कि पूरी मानवता जीवन का प्रकाश है।
बस जीवन के प्रकाश को ही “मैं” मानकर जीते जाओ, तो पीड़ा और चिंता मिट जाती है, और उजला, भोला हर दिन जी सकते हो।
सच्ची मानवीय चेतना, मन के आकाश में चमकने वाला सूर्य है।
वही, हमारा हमेशा कहा जाने वाला जीवन का प्रकाश है।
तुम लोग जिसे “मैं” मान बैठे थे, वह मन के आकाश में तैरते बारिश के बादल हैं।
ऐसी, छोड़ दो तो बहकर मिट जाने वाली, बिना वास्तविकता वाली माया को पकड़कर, “यही मैं हूँ” कहकर मुट्ठी में भींचने की, अब ज़रूरत नहीं।
अँधेरे बारिश के बादलों के घने छाए होने पर धरती का हाल कैसा होता है, यह इस संसार का मौसम देखकर ही समझ आता है न।
मन का मौसम भी बिल्कुल वैसा ही है।
“अपने मन को स्वयं अँधेरा करके, ‘अँधेरा है, अँधेरा है’ कहकर विलाप करने की ज़रूरत नहीं।
तुम्हारा मूल स्वरूप, इतना कमज़ोर नहीं है”
तुम्हारे मन की गहराई से, जीवन के सूर्य (प्रकाश) की ऐसी सीख सुनाई देती है न?
तुम्हें बदल सकने वाले केवल तुम हो।
तुम सचमुच बदलो, तो तुम्हारा संसार वास्तव में बदलता है।
ऐसे लोगों के बढ़ने से, पूरा पृथ्वी-संसार प्रकाशमय होता जाता है।
नए युग की ओर ऐसे सच्चे मार्ग को मन के भीतर चमकाते हुए, हर क्षण को मूल्यवान मानकर अपने आप को विकसित करने का समय बिताकर देखो।
तब, मन का सूर्य जगमगाकर चमकेगा, और उलझ-उलझकर घुटते हुए जीने वाले पुराने स्व को “हल्की मुस्कान” के साथ देख सकने वाले तुम तक पहुँच जाओगे।






