शाश्वत जीवन की धारा पर सवार हो जाओ (2)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
★आने वाली दिव्य दुनिया में उन्नयन (अगली कक्षा) को ठुकराने पर
इस तरह वह समय आएगा जब पृथ्वी की कंपन-आवृत्ति दिव्य क्षेत्र के स्पंदन-लोक में प्रवेश करके पीछे नहीं लौटेगी, इसलिए पृथ्वी पर रहने वाले “मन” अगर
- मनुष्य को मनुष्य न समझें
- कमज़ोरों का ध्यान रखने और रक्षा करने का मन न हो
- वस्तुओं में जीवन न मानकर लापरवाही से बरतें
- स्वतंत्रता का अर्थ गलत समझकर बेकाबू आवेगों से संचालित हों
- प्रकृति को अपनी जागीर समझकर सिर्फ़ तोड़ें और मरम्मत की न सोचें
- इच्छाएँ और अहं-भावनाएँ आचरण का सिद्धांत हों और सबकी खुशी “विन-विन-विन” न बना पाएँ
ऐसे स्वभाव में रहते हुए चेतना-विकास (= दिव्यता-विकास) की ओर न बढ़ें, तो नई दुनिया की गूँज से तालमेल मुश्किल होगा और असहजता महसूस हो सकती है।
वह युग, जब मानवता का बड़ा हिस्सा ऐसे चेतना-स्तर पर ठहरा रहे, उसे अजीब भी न लगे, या “क्या करें” कहकर हार मान चुके लोग बहुमत में हों, बहुत जल्द… हाँ, ज़्यादा से ज़्यादा कुछ दशकों से सौ-कुछ वर्षों में समाप्त होगा।
क्योंकि दिव्यता अभी सतह पर न आई अवस्था में रहने पर, नए स्पंदन-लोक में प्रवेश कर चुकी भविष्य की पृथ्वी पर गूँज न मिलने से रहना मुश्किल हो जाएगा।
इसका मतलब यह नहीं कि मनुष्य पशु में बदल जाएगा, वस्तु बन जाएगा, या मानवता के अलावा किसी के द्वारा मिटा दिया जाएगा।
यह सीधे-सीधे इतना है कि पृथ्वी पर रहने वाली मानवता के मन और शरीर की कंपन-आवृत्ति पृथ्वी-जगत को घेरने वाले स्पंदन-लोक की कंपन-आवृत्ति से मेल नहीं खाएगी।

तो ऐसे लोग गूँज (चेतना-तरंग) मिलने वाले दूसरे तारे के धरती-आकाश में पुनर्जन्म चुनेंगे।
यह स्कूल के हिसाब से स्कूल बदलने के बराबर है, लेकिन ऐसे मामलों में दूसरे तारे पर स्थानांतरण के समय, विद्यार्थी के स्कूल बदलने के रूपक में, कुछ कक्षाएँ नीचे फिर से प्रवेश लेकर दोबारा सीखना पड़ता है।
और तरह-तरह की स्थितियों के अनुभव से ही मिलने वाली “जीवन की बारीकियाँ” बुनियाद से पूरी तरह फिर से सीखनी पड़ती हैं।
यह “मेरी दुनिया मेरी अपनी चेतना बनाती है” वाले ब्रह्मांड के नियम-सत्य से ऐसा होता है, और कोण बदलकर देखें तो “चोर-चोर मौसेरे भाई” कहावत की तरह मिलती-जुलती चेतना-स्पंदन वाले आपस में इकट्ठा होकर अपना-अपना धरती-आकाश बनाते हैं।
इसे ऐसा समझा जा सकता है कि किसी और द्वारा ऐसे ले जाया जाता है, लेकिन सच कहूँ तो सब खुद अपने-आप को दिशा देने का रूप है।
मनुष्य जी पाता है, यह जीवन के होने पर ही है, है न?
वह जीवन हर किसी के मन की गहराई में मौजूद “अटल दिव्यता” है।
वह भीतर निहित दिव्यता स्वयं जीवन के रूप में मूल जगह पर हर व्यक्ति को चला रही है।
इसलिए हर व्यक्ति कैसा भी भविष्य चुने, यह कहा जा सकता है कि उस व्यक्ति की दिव्यता सतही चेतना की वृद्धि-विकास के लिए बस सबसे उपयुक्त चुनाव कर रही है।
ऐसा सबकी आँखों के सामने स्पष्ट सतह पर आने से पहले याद रखने की बात यह है: “किसी के साथ कुछ भी हो, मनुष्य का जीवन नहीं मिटता, और व्यक्तिगत व्यक्तित्व भी लुप्त नहीं होता।”
कोई एक व्यक्ति शरीर में न रहे, चाहे ब्रह्मांड में कहीं भी चला जाए, मनुष्य पूरी तरह लगातार जीता रहने वाला अस्तित्व है। (अगली बार जारी)







