वस्तुओं का जीवन और ब्रह्मांड की दृष्टि (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
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(पिछली बार से जारी)
★विज्ञान के दुरुपयोग की अंतिम अवस्था से बाहर निकलने के लिए जानने योग्य बात
मनुष्य जीवन के सार के प्रति जाग जाए, तो विज्ञान बदल जाता है।
और, विज्ञान बदल जाए, तो संसार में जीना बहुत आसान हो जाता है।
ज़रा सोचकर देखो।
विज्ञान के दुरुपयोग के कारण, सब लोग कितने पतली बर्फ़ पर चलने जैसे संसार में जी रहे हैं।
परमाणु ऊर्जा ऐसी शक्ति है जिसे मानवता अभी पूरी तरह सँभाल नहीं पाती।
और, प्रमुख देश कहे जाने वाले देशों द्वारा बनाए जाने वाले परमाणु बम, हाइड्रोजन बम जैसे हथियार……, जिनकी ऊर्जा निकल पड़े तो स्वयं स्थिति को सँभाल न सकें, पृथ्वी को कई बार नष्ट करने के बाद भी बच जाएँ इतने हथियार, देशों के नेता न फेंक पाते हैं, और दूसरे देशों को डराने के उद्देश्य से रखे रहते हैं, यह बात भी पृथ्वी की निश्चिंतता को दूर करती जा रही है।
ऐसा होने पर परेशानी केवल पृथ्वी की मानवता को नहीं होती।
दूसरे जीवों और स्वयं पृथ्वी को तो होती ही है, दूसरे तारों तक भी उसका बुरा असर पहुँचता है, और वह ब्रह्मांड का प्रदूषण भी बन रहा है।
इसलिए अनेक तारों से पृथ्वी पर जाँच-दल भेजे गए, और वे तरह-तरह की जाँच करने लगे।
झूठ लगे, तो जाँचकर देखो कि पृथ्वी पर बार-बार उड़न तश्तरियाँ दिखना कब से शुरू हुआ।

★तुम लोग बदलो तो संसार बदलता है
ब्रह्मांडीय मानवता के सब लोग, हृदय से पृथ्वीवासियों के चेतना-विकास की कामना करते हैं।
इसका प्रमाण यह है कि पृथ्वी पर हमला करने वाले अंतरिक्ष के प्राणी तो प्रकट नहीं होते, है न।
इतना ही नहीं, जब परमाणु संयंत्र में दुर्घटना होने वाली हो, या परमाणु बम गिराया जाने वाला हो, तब अंतरिक्ष के भाई पास तक जाकर, उसकी ऊर्जा का निकलना थोड़ा भी कम हो, इसके लिए चुपचाप विशेष ऊर्जा डालकर, नुकसान के फैलाव को रोकते भी हैं।
पृथ्वीवासी यह मान्यता रखें कि भौतिक स्पंदन भी और मानसिक स्पंदन भी, सब कुछ जीवन के मूल स्रोत से प्रकट हुई, जीवन से भरी चीज़ें हैं, इसके लिए हम चुपचाप तुम लोगों के मन पर काम कर रहे हैं।
वह कौंध जैसे अंतर्ज्ञान के रूप में, और तुम लोगों के रोज़ बिना ध्यान दिए सोचे जाने वाले विचारों के रूप में, तुम लोगों की स्वतंत्रता छीने बिना, बहुत सहज ढंग से, बिना जताए, तुम लोगों के विचार, वचन और कर्म से तालमेल बिठाकर, हमारा काम तुम लोगों पर असर डाल रहा है।
इसलिए, पहले तुम लोग बदलो।
पता ही न चले कब दिव्य क्षेत्र की चेतना तुम्हारे लिए सामान्य बन जाए, ऐसे व्यक्ति बनो।
वह, तुम लोग अपने बारे में ऐसा होगा सोचो तो होता है, और ऐसा नहीं होगा सोचो तो नहीं होता।
इस तरह, अंत में बात बड़ी सीधी-सपाट हो जाती है।
अभी तुम कैसे होना चाहते हो?
आगे तुम कैसे होना चाहते हो?
तय करने वाले तुम लोग हो।
“मैं ऐसा बनूँगा” जैसा तय करोगे, नियति निश्चित रूप से वैसे ही बदलेगी।
ठीक है न।
यह दृढ़ विश्वास रखकर जियो।
तब तुम निश्चित रूप से पृथ्वी के भविष्य को भलाई की ओर ले जाने वाले अग्रिम दल के एक सदस्य के रूप में जी सकोगे। (समाप्त)







