जीवन की लौ और आदर्श का आयामी उत्थान
प्रकाशित अद्यतन
★जीवन की लौ जलाकर जियो
जीवन की लौ जलाकर जियो।
इसका अर्थ न तो यह है कि मुश्किल में घिरकर आख़िरी ताक़त झोंककर जियो, न यह कि भरपूर जोश जलाकर अति-सकारात्मक ढंग से जियो।
और यह क्रोध या द्वेष जैसी लाल लपटों से भी अलग है, और दुख या निराशा जैसी नीली-सफ़ेद लपटों से भी अलग।
न इसका वासना से कोई संबंध है, न दूसरी तरह-तरह की स्वार्थी इच्छाओं से।
जीवन की लौ वह शक्ति है जो सबको जीवित रखती और जीवंत करती है।
इसलिए जब कोई जीवन की लौ जलाकर जी रहा होता है, तो जो वह करना चाहता है वह अपने आप संसार और लोगों के हित में होता है, और उसमें कितना भी जुटे, ज़रा भी थकान महसूस नहीं होती।
अब तक की सामान्य सोच से, तुम लोग जिस लौ की कल्पना करते हो, चाहे वह भौतिक आग हो या मन के भीतर की आग, तेज़ी से धधकने के बाद आख़िरकार बुझ जाती है, और केवल राख छोड़कर बिना निशान मिट जाती है, है न।
लेकिन जीवन की लौ अलग है।
कितना भी जलाओ, ख़त्म हुए बिना जलती रहती है, सबको उत्पन्न करती, पालती और पोषती है, और पूरे ब्रह्मांड का भी विकास करने वाली ऊर्जा है।
इसे विकास और सृजन की शक्ति, सब कुछ उत्पन्न करने और चलाने वाली पावर, अनंत जीवन-शक्ति का स्रोत भी कहा जा सकता है।
ऐसी शक्ति हर व्यक्ति के भीतर है।
उस शक्ति के अस्तित्व का बोध होता है या नहीं, उसे अपने भीतर खोज पाते हो या नहीं, यह आने वाले युग में जीने के लिए मन का एक महत्वपूर्ण तत्व बनता जाएगा।

★आदर्श का आयामी उत्थान
इसके लिए महत्वपूर्ण घटना है, आदर्श का आयामी उत्थान।
आदर्श के बारे में अपनी धारणा को दिव्य क्षेत्र तक छलाँग लगवाकर ऊपर उठाओ।
ऐसा करो तो कुछ सोचना, कुछ कहना, कुछ कर्म में उतारना, इतना आनंददायक, इतना सुखद और इतना कृतज्ञता भरा हो जाता है कि बस।
क्योंकि जिस आदर्श की कल्पना की, वह एक के बाद एक यथार्थ बनता है और साकार होता रहता है।
अब तक आदर्श पहुँच से बाहर की बात, अपने आप से बहुत दूर की बात, सपने के भी सपने जैसी बात था, है न।
चेतना की स्थिति को दिव्य क्षेत्र में रखो, तो आदर्श का आयामी उत्थान होता है, और सब कुछ साकार हो सकने वाली बात बन जाता है।
आदर्श और यथार्थ के बीच की दूरी नाटकीय रूप से घट जाती है।
आदर्श दिव्य क्षेत्र के स्पंदन-क्षेत्र में है, इसलिए चेतना दिव्य क्षेत्र में प्रवेश करे, तो सपना दर्शन (विज़न) बन जाता है।
इसके लिए, जान-बूझकर चेतना का उपयोग करते हुए समय बिताना अच्छा है।
और चेतना का जान-बूझकर उपयोग करने के लिए, रोज़ की साँस को धीमा और सहज करो।
ऐसा करो, तो अचेतन रूप से शरीर से चिपके आदत वाले विचार बहने बंद हो जाते हैं, इसलिए जीवन के मूल स्रोत की चेतना सतह पर आने लगती है।
इस तरह जीवन-स्पंदन का सतही चेतना में प्रकट हो आना ही दिव्य चेतना है, और दिव्य क्षेत्र में जड़ जमाई उस चेतना का उपयोग करते हुए जीना ही जीवन को जलाकर जीना है।
समझ आया न?
दिव्य चेतना में किसी विरोधी चीज़ के न होने के कारण, सकारात्मकता की ओर झुकने की प्रतिक्रिया भी नहीं होती, और पसंद की चीज़ नापसंद भी नहीं होती।
सकारात्मक कहीं तक भी जाओ सकारात्मक ही रहता है, और पसंद की भावना अनंत काल तक बनी रहती है, और उससे प्रेम करती रहती है।
यही स्वयं जीवन की चेतना है।
जीवन की चेतना के लिए सबसे बड़ा आनंद सबके काम आ पाना है, इसलिए वह इसमें अपना नुक़सान या फ़ायदा न होना, ऐसे लाभ-हानि के पैमाने से बातों को नहीं देखती।
वह मन हर किसी के भीतर है।
इसलिए उसे प्रकट करके देखो।
तरीका तो बता दिया न।
अब ऐसा युग है जिसमें केवल कर्म ही सार्वभौमिक सत्य को प्रकट करता है।
केवल देखते रहने, केवल सोचते रहने की बजाय, चलकर देखने से कुछ दिखाई देने लगता है।
इसलिए बस करो।
अमल ही चेतना के विकास का सबसे छोटा रास्ता है।
तुम्हारे भीतर धुँधले पड़े आदर्श को साकार करने के लिए, अभी ही कदम उठाओ।
क्योंकि उसी के आगे, चेतना की विस्तृत दृष्टि वाली दिव्य मानवता का भविष्य खुला है।







