पूर्वज-आत्माएँ और भौतिक शरीर का मन (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
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(पिछली बार से जारी)
★पूर्वज-आत्माओं के काम करने का ढंग
इसका क्या अर्थ है, तो सीधे-सीधे कहें तो “एक ही अनेक जीवन है, अनेक ही एक जीवन है”, यानी एक जीवन अनेक जीवनों में बँटकर काम करता है, या अनेक जीवन एक जीवन में सिमटकर काम करते हैं, ऐसा जगह-जगह हो रहा है।
अगर रूप में प्रकट शरीर और अहं के विचारों को ही मनुष्य का असली रूप मानो, तो यह सिद्धांत समझ में नहीं आता और पकड़ से बाहर की बात लग सकती है, लेकिन जीवन-प्रकाश में लौट चुकी चेतना में अपने और पराए को अलग करने वाला भेद-भाव नहीं होता, इसलिए ऐसा बहुत होता है कि B जी और C जी के व्यक्तित्व मिलकर A जी के रूप में प्रकट होते हैं, और उसी समय B जी, C जी और D जी एक होकर E जी के रूप में प्रकट होते हैं।
इस अर्थ में, “ज्ञान-प्राप्ति का अर्थ है भेद (अलगाव की मान्यता) को हटाना” यह बात सत्य कही जा सकती है (जापानी में ज्ञान-प्राप्ति “सातोरि” सुनने में “सा-तोरि” यानी “भेद हटाना” जैसा है)।
इस लोक में हो या उस लोक में, दिव्यता को फिर से जगा चुकी चेतना वाले व्यक्ति में “मैं, मैं” वाला भाव नहीं होता, इसलिए वह किसी भी रूप में प्रकट होकर मनचाहे ढंग से बदलते हुए काम कर सकता है।
सच कहूँ तो, तुम लोग भी अनेक आत्माओं की मिली-जुली आत्मा हो।
फिर भी, वे मूल की अनेक आत्माएँ उस लोक में अपने मूल व्यक्तित्व में ही काम कर रही होती हैं, या इस लोक में कहीं किसी और के शरीर में बँटकर प्रवेश करके काम कर रही होती हैं।
इस तरह, एक ही अनेक है और एक साथ कई जगह होने के सिद्धांत से काम करना ही पूर्वज-आत्माओं का ढंग है।
और, जीवन-प्रकाश के मूल स्रोत के और पास पहुँचे उच्च देवता तो, एक ही मूल चेतना को करोड़ों, अरबों, बल्कि उससे भी अधिक, अनगिनत व्यक्तियों में बाँटकर प्रकट करके एक साथ काम भी कर सकते हैं।
समझे?
ऐसी बातें, जब व्यक्तिगत स्व की चेतना जीवन के महासागर में घुलकर फैल जाती है और दिव्य चेतना सतह पर आ जाती है, तो अपने-आप समझ में आने लगती हैं, इसलिए अभी न समझ आएँ तो कोई समस्या नहीं, निश्चिंत होकर “ठीक से समझ नहीं आया, लेकिन ऐसा ही है” सोच लो, तो भी ठीक है।
आगे चलकर अपने-आप समझ आने का समय आएगा।

तो, इस बार की बात के बीच मैंने कहा था न कि आज के समाज में तुम लोगों की तरह चेतना के विकास की ओर उन्मुख होकर जीने वालों के लिए, विशेष दायित्व वाली पूर्वज-आत्माएँ हर व्यक्ति की निजी संरक्षक आत्माओं और संरक्षक देवताओं का साथ देकर काम करती हैं।
उनमें हमारी तरह दूसरे तारों से जुड़े लोग भी हैं, और पृथ्वी के देव-आत्मा लोक में काम करने वाले भी हैं।
और, वे इस तरह कई विशेष व्यक्तियों पर काम क्यों करने लगे, तो इसलिए कि मानव-जीवन के सार को फिर से जगाकर जीने का प्रयास करने वाली भौतिक मनुष्य की चेतना, पृथ्वी के विकास की कामना करने वाले अनेक देवताओं और शुभ आत्माओं की दृष्टि में, एक अनमोल, बेशकीमती चीज़ है।
तुम लोगों का आयामी उत्थान पूरा होना, उन बहुत से लोगों के असेंशन में भी मदद बनता है जिनकी नज़र अभी चेतना के विकास की ओर नहीं गई है।
इसलिए तुम लोगों में ज़बरदस्त जीवन का प्रकाश-सार उँडेला जा रहा है, और तुम्हें इस ओर ले जाया जा रहा है कि तुम अपनी इच्छा से आयामी उत्थान पूरा कर सको।
और, तुम लोगों से पहले मानव-जीवन का सत्य जान चुकी पूर्वज-आत्माएँ, हर हाल में तुम लोगों की आत्मा की आत्मनिर्भरता चाहती हैं, इसलिए ऐसे ढंग से मदद नहीं करतीं जो आसानी से समझ में आ जाए।
तो फिर वे क्या करती हैं, तो किसी दूसरे भौतिक मनुष्य के ज़रिए मदद करती हैं, या उस व्यक्ति के अंतर्ज्ञान में बुद्धि उँडेलकर मदद करती हैं।
पृथ्वी-लोक के पूर्णता तक पहुँचने वाली सदी, यानी 21वीं सदी में जीने वाले मनुष्य, “भगवान, मेरी मदद कीजिए” ऐसी विनती किए बिना भी, अपने से हो सकने वाला सबसे अच्छा प्रयास करते हुए, बस हायर सेल्फ़ (संरक्षक देवता और आत्माएँ और पूर्वज-आत्माएँ) की पर्दे के पीछे वाली सहायता के प्रति कृतज्ञ होकर जीते रहें, तो सब कुछ ठीक से चलने लगता है।
ठिठककर खड़े रहकर मदद माँगने वाले से ज़्यादा, रेंगकर या लुढ़ककर भी आगे बढ़ने की कोशिश करने वाले के रास्ता खोल पाने की संभावना ज़्यादा है, यह तो समझ में आता है न।
संतानों के विकास की कामना करने वाले पूर्वजों का काम, ऐसे ही साधारण प्रयासों में इकट्ठा होकर काम करता है।
और, ऐसे देवता और आत्माएँ पर्दे के पीछे नींव के पत्थर की तरह काम करना ही अपना मिशन मानती हैं, इसलिए “मैं 〇〇 हूँ” कहकर शान से अपना नाम नहीं बतातीं।
जिनकी आत्मिक शक्ति थोड़ी खुलने लगी है, उनके पास सूक्ष्म लोक की अमुक्त आत्माएँ कभी-कभी मनुष्य को उत्तेजित (फूला हुआ) करने वाले किसी ऐतिहासिक व्यक्ति का नाम लेकर आ जाती हैं, लेकिन ऐसी बातों में फँसकर हवा में उड़ने या उत्तेजित होने से सावधान रहना।
उस लोक के लोगों से बातचीत तो, आत्मिक लोक का वीडियो-फ़ोन आ जाने पर आगे चलकर कोई भी कर सकेगा, और स्वार्थ मिट जाए तो ऐसा समय भी आएगा जब बगल में बैठे व्यक्ति से बात करने की तरह बात कर सकोगे, इसलिए उसकी कामना करने की कोई ज़रूरत नहीं है। (समाप्त)






