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दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

चेतना के विकास का सही रूप (2)

प्रकाशित अद्यतन

(पिछली बार से जारी)

★चेतना के विकास की ओर बढ़ने वाले व्यक्ति की चेतना का सही रूप

यहाँ, चेतना के विकास की ओर बढ़ने वाले व्यक्ति की चेतना का सही रूप क्या है, इस पर थोड़ा गहराई से नज़र डालें।

यहाँ जिसे “चेतना का सही रूप” कहा गया है, उसका अर्थ है जीवन के स्रोत के और निकट पहुँची मानसिक स्थिति (आयामी उत्थान पाई हुई चेतना की स्थिति); पर “बस मैं सुखी हूँ तो सब ठीक है” सोचने जैसी चेतना को क्या तुम सचमुच चेतना का विकास पा चुकी मानसिक स्थिति मान सकते हो?

नहीं मान सकते?

हाँ, तो पूछता हूँ, मनुष्य के रूप में चेतना का सही रूप, चेतना का विकास पाई हुई मानसिक स्थिति, आयामी उत्थान पाई हुई चेतना की स्थिति, ठोस रूप में कैसी मानसिक स्थिति है, तुम्हें क्या लगता है?

“ऐसी मानसिक स्थिति जिसमें दूसरे और अपने के बीच की बाड़ मिट गई हो”

हाँ,

“ऐसी मानसिक स्थिति जो प्रेम के सिवा और कुछ न हो”

हाँ हाँ,

“ऐसी मानसिक स्थिति जिसमें समष्टि ही मैं हूँ, यह सहज रूप से महसूस हो”

हाँ, बिल्कुल यही, सब सही उत्तर हैं।

अगर समष्टि ही मैं हूँ यह महसूस हो सके, तो जब पृथ्वी पर कहीं असामंजस्य की स्थिति अभी बाक़ी है, तब “असेंशन तो पूरा हो चुका” ऐसा विचार मन में नहीं कौंधता।

चेतना जीवन के मूल स्रोत के जितना निकट जाती है, उतना ही उन लोगों की, जो अभी सत्य को भूले हुए हैं, चिंता, कष्ट, दुःख, क्रोध, अकेलापन वग़ैरह सीने में उमड़ आते हैं, और स्वयं के माध्यम से निकलने वाला जीवन के मूल स्रोत का महाप्रकाश पृथ्वी-लोक में विकीर्ण किए बिना रहा नहीं जाता।

यह ऐसा नहीं कि अभी भी परेशान लोगों के भावनात्मक विचारों के भँवर (द्वैत के टकराव के दलदल) में फँसकर खुद भी विवेक खो चुकी मानसिक स्थिति में ऐसा सोचा जाए; बल्कि अपना मन पूरी तरह निर्मल रहते हुए, कैसी भी कीचड़ भरी दुनिया में जाकर भी मन मैला न हो, और धरती पर बचे सारे अँधेरे पर जीवन का प्रकाश डालकर, पृथ्वी-जगत का सब कुछ केवल-प्रकाश के महान सामंजस्य वाली दुनिया में ऊपर उठे, इसके लिए मानवता की चेतना के जागरण की प्रेरणा देने वाली ऊर्जा अंतरतम से उमड़कर रुकती नहीं, इस स्थिति को कहते हैं।

वह ऊर्जा कोई ऐसी घटिया चीज़ नहीं जो इस्तेमाल करते ही ख़त्म हो जाए; वह ज़रूरत के अनुसार अनंत रूप से उमड़ने वाली जीवन के मूल स्रोत से आने वाली ऊर्जा है।

और वह अनंत ऊर्जा, उमड़कर रुकती नहीं कहने पर भी, ऐसी नहीं जिसे खुद नियंत्रित न किया जा सके; अपनी दिव्य चेतना से उसे बड़ा या छोटा, कोमल या कठोर, स्वच्छंद रूप से नियंत्रित करके प्रकट किया जा सकता है।

वही है दिव्य चेतना की घोषित मानसिक स्थिति, चेतना के घोषणा कर रहे होने की स्थिति, इ-नोरी (इच्छा की घोषणा) की चेतना, प्रार्थनामय हृदय का सत्य। (अगली बार जारी)

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

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वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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