चेतना के विकास का सही रूप (3)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
★दिव्य चेतना की घोषणा और जीवन का संचालन
इसलिए,
“सब सुखी हों”
“मानवता दिव्यता के प्रति जागे”
“पृथ्वी-लोक में शांति हो”
“धरती पर जीवन का मूल सामंजस्य चित्रित हो”
इस तरह, बस गूँजकर निकलने वाला मूल स्रोत एक ही हो, तो शब्द कोई भी चलेंगे; पर समष्टि के महान सामंजस्य की घोषणा करने वाला मन हमेशा बनाए रखकर जीने वाले व्यक्ति का मन हमारी चेतना की आवृत्ति के समान तरंग-दैर्ध्य पर होता है, इसलिए पृथ्वी के देवताओं के सहयोग के प्रकाश के साथ हम ब्रह्मांड की मानवता के सहयोग का प्रकाश भी जुड़ जाता है, और वे प्रकाश उस व्यक्ति के मन-शरीर के माध्यम से, तुम लोगों के अपने जीवन-प्रकाश के वर्ग जैसा प्रबल प्रकाश बनकर आसानी से बहने लगते हैं; इसलिए उस व्यक्ति के आसपास सामंजस्य की मात्रा त्वरित गति से गहराती जाती है।
पिछले साल के अंत से कहता आया हूँ न कि 2017 में दुनिया की कई जगहों पर तरह-तरह की चीज़ें होंगी, पर तुम लोग ठीक रहोगे।
भविष्यवाणी जैसा कुछ ज़्यादा करना नहीं चाहता, पर तुम लोगों जैसे, कुछ हद तक उच्च-आयामी चेतना अपने में साध चुके लोग, कुछ भी हो जाए, परिस्थिति के अनुसार निपटने का ढंग जानते हैं, इसलिए जान-बूझकर पहले से बता दिया था।
और आधुनिक सभ्यता अभी, न जाने कितनी बार के, एक महत्वपूर्ण मोड़ के बीच में है।

पर तुम लोगों का मन आशा का प्रकाश कभी बुझाए बिना, मानवता का बड़ा हिस्सा प्रकट स्थिति का अनुभव करने और देखने-सुनने से चाहे कितना भी इधर-उधर भटके, उसके बीच रहकर “ठीक है! ज़रूर अच्छा होगा। सब कुछ पूर्ण सिद्धि तक पहुँचने की प्रक्रिया है!” ऐसा प्रकाश का कोतोदामा धरती पर बिखेरकर, मानवता से निकलने वाली नकारात्मक विचार-तरंगों को मिटाकर शुद्ध कर रहा है।
इसीलिए, अदूरदर्शी भविष्य-दृष्टि के विचार-स्तर से देखने पर भविष्य में चाहे कितनी भी आशा न दिखे, जीवन के मूल जगत में मौजूद पूर्ण शांति वाले दिव्य जगत को भीतर की दुनिया से क्रमशः, ठोस रूप से, सतही दुनिया में चित्रित किया जा पा रहा है।
आशा न दिखने का कारण यह है कि तुम शरीर से चिपके विचारों की दृष्टि में हो; उसके भीतर के भीतर मौजूद जीवन के महासागर से देखो, तो सब कुछ पूर्ण सामंजस्य तक पहुँचने की क्षणिक घटना है, चलने वाले रास्ते के बीच का दृश्य भर है।
सब कुछ ठोस रूप से पृथ्वी-लोक की पूर्णता की ओर बढ़ रहा है।
जब तक इस सत्य को दृढ़ता से पकड़कर जीने वाले तुम लोग हो, पृथ्वी-जगत ज़रूर ब्रह्मांडीय समाज में शामिल होकर अनंत प्रगति और उन्नति साकार करता जा सकता है।
इस सबमें महत्वपूर्ण है चेतना के इस्तेमाल का ढंग, विचारों के इस्तेमाल का ढंग।
रोज़ अनजाने में मन में कौंधने वाले विचारों को भीतर के मन, दिव्य चेतना से देखकर, उन्हें जीवन का प्रकाश देना किसी भी चीज़ से बढ़कर महत्वपूर्ण है।
क्योंकि हर एक व्यक्ति का ऐसा जीवन-संचालन ही पृथ्वी-जगत में असेंशन पाई हुई दुनिया रचकर, उज्ज्वल भविष्य चित्रित करने की मूल शक्ति, मूल ऊर्जा बनता है। (समाप्त)






