लाभ-हानि से परे निर्णय का मानदंड अपनाते जाने के लिए (1)
प्रकाशित अद्यतन
★निर्णय के मानदंड का आयामी उत्थान पाने के लिए
अगर तुम असेंशन चाहते हो और चेतना के विकास की ओर बढ़ रहे हो, तो रोज़-प्रतिक्षण आने वाले चुनाव-निर्णय के समय, चीज़ों का निर्णय लाभ-हानि से मत करना।
हालाँकि, तुरंत शायद न हो पाए, और काम की जगह जैसे ऐसा करना ही पड़े, ऐसे समय भी होते हैं।
ऐसा चाहते हुए भी तुरंत लाभ-हानि से ऊपर न उठ पाओ तो निराश होने की ज़रूरत नहीं; उसका लक्ष्य रखकर रोज़ के निर्णय का अभ्यास करते जाओ, तो एक दिन ज़रूर हो पाएगा।
व्यापार जैसी जगहों में, अगर खुद लगे कि अपनी चेतना अभी बिना ज़ोर लगाए ऐसा करने तक नहीं पहुँची, तो अपवाद के रूप में केवल व्यावसायिक गतिविधि के समय लाभ-हानि से निर्णय करना ठीक है, ऐसा “समय-सीमित नियम” खुद बना लेना भी चलेगा।
पर बाक़ी जगहों पर लाभ-हानि से परे दिव्य प्रज्ञा (दिव्य चेतना में कौंधने वाली प्रज्ञा) से, समष्टि के सामंजस्य से जुड़ने वाला निर्णय करना अच्छा है।
आगे चलकर जब मनोदशा अभी से और आगे बढ़ेगी, तब उन व्यावसायिक गतिविधियों में भी, जहाँ पहले का अपना सोचता था कि लाभ-हानि सोचे बिना काम नहीं चलेगा, दिव्य प्रज्ञा पर आधारित सामंजस्योन्मुख निर्णय करने पर भी हानि नहीं होगी; पर यह स्वाभाविक रूप से ऐसा होता जाता है, इसलिए अभी ज़बरदस्ती ऐसा करने की कोशिश या अपने पर थोपा हुआ व्यवहार करने की ज़रूरत नहीं।

★संक्रमणकालीन घटना के रूप में व्यावसायिक गतिविधि में सत्य को लागू करने का तरीक़ा
तो जब वह समय आए तो शायद काम आए, इसलिए समझाता हूँ कि “व्यावसायिक गतिविधि में लाभ-हानि छोड़कर व्यवहार करने पर भी हानि नहीं होती” इसका क्या मतलब है।
पहले समझाऊँ कि समष्टि के सामंजस्य को निर्णय का मानदंड बनाकर व्यवहार करने पर क्या होता है: मुझे हानि हो और केवल सामने वाले को लाभ, या सामने वाले को हानि हो और केवल मुझे लाभ, ऐसे द्वैत के भीतर के नतीजे प्रकट नहीं होते; बल्कि मुझे भी, सामने वाले को भी, और समष्टि के लिए भी लाभ वाला नतीजा प्रकट होने लगता है।
इसलिए “सामने के लाभ-हानि में उलझने की ज़रा भी ज़रूरत नहीं” यह बात बनती है।
ऐसा क्यों होता है, तो एक शब्द में कहें तो विश्व-दृष्टि जड़ से पलट चुकी होती है; जब चेतना जीवन के प्रकाश की अनंत दुनिया से जुड़ी हो, तब सीमित दुनिया में सीमित वस्तुओं या धन को एक-दूसरे से छीनने जैसी बात नहीं रहती।
चेतना का विकास पा चुके लोगों में बिना अपवाद जो हो रहा है, वह ऐसी खुशी और कृतज्ञता के अनंत चक्र की शृंखला है, और उस घेरे में तुम भी आ जाओ, तो तुम्हारे और तुमसे जुड़े लोगों के साथ भी केवल सकारात्मक स्थितियाँ ही होने लगती हैं।
क्योंकि जब सोचना केवल समष्टि का सामंजस्य हो, और बोलना-करना भी केवल समष्टि का सामंजस्य लाने वाला हो, तब अपनी चेतना की चाही हुई चीज़ें चेतना के विकास से पहले की तरह उलटी वास्तविकता खींचे बिना, अनंत समग्र चक्र को स्वाभाविक रूप से घटना-रूप में लाकर अपने भाग्य में प्रकट कर पाती हैं।
हमारी नज़र से तुम लोगों की दुनिया अभी संक्रमणकालीन स्थिति में श्रम और वस्तुओं के मूल्य का लेन-देन पैसे से करने वाली दुनिया है, इसलिए अनजाने ही लाभ-हानि से सोच लिया जाता है; पर एक दिन सब सामने के लाभ से चिपके बिना भी अनंत समृद्धि प्रकट होगी, और खाने, पहनने और रहने-बसने में किसी को परेशानी नहीं रहेगी। (अगली बार जारी)






