“मिज़ुकारा” और “ओनोज़ुकारा” का एकीकरण (पूर्वार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
★”मिज़ुकारा” और “ओनोज़ुकारा” के बारे में
कुछ दिन पहले, “मिज़ुकारा को छोड़कर ओनोज़ुकारा के रूप में जीना” इस परम जीवन-शैली की बात की थी न।
उस बात से कुछ लोगों को ठीक से समझ नहीं आया, ऐसा लगता है, इसलिए आज वह बात दूसरे कोण से फिर से करेंगे।
क्योंकि यह बहुत महत्वपूर्ण बात है।
“मिज़ुकारा को छोड़कर ओनोज़ुकारा के रूप में जीना” को दूसरे शब्दों में कहें तो, “मिज़ुकारा और ओनोज़ुकारा को एक करके जीना” ऐसा भी कहा जा सकता है।
ऐसा क्यों कहा जा सकता है…… यह हमेशा की तरह समझाने वाले थे, लेकिन उससे पहले कुछ लोग “मिज़ुकारा” और “ओनोज़ुकारा” का अंतर ही नहीं समझ पाए हैं, ऐसा लगता है, इसलिए आज उसी बात को आसान करके समझाते हैं।
“मिज़ुकारा”, यानी “स्वयं से”, का अर्थ है भौतिक शरीर से चिपकी विचार-चेतना, दिव्यता और कर्म के मिलकर धुँधली हुई अहं-चेतना।
और “ओनोज़ुकारा”, यानी “अपने आप, स्वाभाविक रूप से”, का अर्थ है मूल जीवन-चेतना, दूसरे शब्दों में, ब्रह्मांड को रचने वाली अनंत सृजन-ऊर्जा को समाए महाजीवन से सीधे जुड़ी चेतना, जीवन के प्रकाश की चेतना।
इस संबंध को सीधे-सीधे दिखाने वाले दूसरे शब्द हैं “आरिनोमामा” और “आरुगामामा”, दोनों का अर्थ है “जैसा है वैसा”।
“आरिनोमामा” का अर्थ है भौतिक लोक में जैसा प्रकट हो रहा है वैसा ही तथ्य।
और “आरुगामामा” का अर्थ है ब्रह्मांड के हृदय के रचे हर तरह के आयामी स्तर वाले संसार, और उनमें भी दिव्य आयाम में स्थायी रूप से मौजूद, कभी न बदलने वाला जीवन का सत्य।

★दिव्य घड़ी के आगमन के ठीक पहले
इन दोनों बातों को मिलाएँ तो, मिज़ुकारा का अर्थ है आरिनोमामा के संसार में बस गए विचारों पर आधारित पहचान, और ओनोज़ुकारा का अर्थ है आरुगामामा के संसार को अपना घर बनाकर, पूरे ब्रह्मांड में दौड़ते हुए सक्रिय रहने वाले जीवन-देव की सृजन-गतिविधि।
यह बात, इंटरनेट पर खोजकर भी सच्चा उत्तर आसानी से नहीं मिलता, और बेशक, शब्दकोश खोलकर भी नहीं मिलता।
क्योंकि इंटरनेट और शब्दकोश, मुख्य रूप से भौतिक संसार से देखे गए शब्दों के अर्थ बताते हैं।
सच्चा सत्य, हर युग में अपने ही जीवन की गहराई में होता है।
वह ऐसे चेतना-आयाम में है जो व्यक्तिगत स्व को पतला करके महान स्व में लौटाए बिना समझ नहीं आता।
इसीलिए, “मिज़ुकारा और ओनोज़ुकारा को एक करो” कहते हैं, या “आरिनोमामा के भीतर के आरुगामामा को पहचानो” कहते हैं।
मनुष्य का सत्य, ब्रह्मांड को रचने वाले महान ज्ञान का सीधा अंश (मन का अंश, ईश्वर का अंश) है।
अनेक दूसरे जीव, और प्रकृति के पदार्थ आदि, सब उसकी रचनाएँ हैं।
दूसरे शब्दों में, कह सकते हैं कि मनुष्य सृष्टिकर्ता के मन का अंश है, ब्रह्मांड की सृजन-ऊर्जा से निकला प्रकाश का अंश है।
इस तथ्य को पूरी तरह भूलकर, हज़ारों, दसियों हज़ार साल तक भौतिक पुनर्जन्म दोहराती आई है पृथ्वी की मानवता।
उस बीच, दूसरे जीवों के घर छीने, और जल, वायु और धरती को गंदा भी किया न।
लेकिन अब, वह दोहराव भी जल्द समाप्त होगा।
क्योंकि पृथ्वी-लोक के एक महान विकास की दिव्य घड़ी पास आ गई है।
ऐसा क्यों कहते हैं, तो इसलिए कि मूल रूप से, अभी इस युग में पृथ्वी-लोक का छलाँग भरा विकास होगा, यह पृथ्वी नाम के तारे के जन्म के समय से ही तय था। (अगली बार जारी)






