“मिज़ुकारा” और “ओनोज़ुकारा” का एकीकरण (उत्तरार्ध)
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इसी नाम का पिछला लेख
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(पिछली बार से जारी)
★”ओनोज़ुकारा” को ही अपना स्व मानकर जियो
ऐसी स्वर्ग की घड़ी पास आ चुकी है, फिर भी आज भी अहं के कहे अनुसार दूसरों की आलोचना करके अपना बचाव करना, अपनी रक्षा करना, दूसरों को धक्का देकर भी तुलना में अच्छी जगह पाना, यह सब कितनी बर्बादी है, है न।
ऐसे अपने-केंद्रित विचार, वचन और कर्म से अब आगे निकलना ही होगा।
दोहराकर कहता हूँ, तुम लोग ब्रह्मांड की सृजन-बुद्धि को उस तारे पर फैलाने वाले, जहाँ तुम अभी हो, और “ओनोज़ुकारा” (स्वतः, अपने-आप) होने वाले महान ब्रह्मांड के सामंजस्य को रचने वाली ब्रह्मांडीय दिव्य आत्माएँ हो।
अपनी खुशी तो, पूरे की सेवा करते हुए जीते-जीते अपने-आप पूरी होगी ही, है न।
“नहीं होगा, असंभव है, यह तो झूठ ही है”, ऐसी आत्म-सीमा वाली विचार-आदतों में बहकर, सच्चे सत्य को तर्क से परख न पाने के कारण ही, तुम बस नहीं कर पाए थे।
लेकिन अब से ऐसा नहीं होगा।
क्योंकि तुम लोग जीवन के सत्य पर खड़े होकर सब कुछ देखोगे।
उन आँखों में दिखेगा, सबका देवताओं के रूप में चमकते हुए जीने वाला, जीवन के सार वाला रूप।
हर कोई इसी क्षण भी, सच में दिव्यता से निकले जीवन के प्रकाश को जी रहा है।
कैसे भी अप्रिय पक्ष को सतह पर लाकर जीने वाले व्यक्ति में भी, दिव्यता बिना बदले झिलमिला रही है।
उस सत्य को परख लो।
इसका अर्थ है, आगे की आत्म-चेतना को “मिज़ुकारा” (स्वयं अपने ज़ोर से) के रूप में नहीं, बल्कि “ओनोज़ुकारा” के रूप में जीना।

★”मिज़ुकारा” और “ओनोज़ुकारा” एक हो जाएँ, तो जीवन का सत्य खुलकर दिखने लगता है
सच में समझ आने तक कितनी भी बार कहूँगा, केवल “आरिनोमामा” (जैसा ऊपर दिखता है वैसा) देखकर, उसे “आरुगामामा” (जैसा वास्तव में है वैसा) समझने की भूल मत करना।
“आरिनोमामा” सीमित है, और “आरुगामामा” अनंत है।
यह अंतर समझ पाने के लिए, सतही चेतना को दिव्य क्षेत्र में स्थिर करके जीना अच्छा है।
उसका तरीका है, रोज़ की साँस को बहुत धीमा और आरामदायक, बहुत धीरे-धीरे रखकर समय बिताना।
चेतना के ढंग को ही बदलने की कोशिश करो, तो वहाँ इच्छा-शक्ति सक्रिय हो जाती है, इसलिए बाद में उलटी मार ज़रूर पड़ती है, लेकिन साँस को धीमा करके स्थिर हुई चेतना में कोई उलटी मार नहीं होती, न अच्छा-बुरा, न पसंद-नापसंद, और सब कुछ जैसा होना चाहिए वैसा है, यह तथ्य सही-सही प्रतिबिंबित होने लगता है।
वही “ओनोज़ुकारा” वाली चेतना है, और दिव्य क्षेत्र में स्थित दिव्यता का मन है।
“मैं, मुझसे, मुझे, मेरा, मेरे लिए, मैं भी, मैं तो”, इस तरह मैं, मैं, मैं, मैं सोचना, सच में न मन है न चेतना, बल्कि जीवन-ऊर्जा के दुरुपयोग से छोड़े गए, मिट जाने योग्य सीमित विचार हैं।
उन्हें शांति से देखकर, “अच्छा, ऐसे प्रकट हुआ, इसका अर्थ है कि इससे विचारों की एक और आदत मिट गई”, ऐसा पहचान लो, तो सच में वह कर्म मिट जाता है।
लेकिन फिर तुरंत वैसा ही आ जाता है, ऐसा कहते हो?
हाँ, वह दूसरे समय बनाया गया कर्म है।
अभी मिटा कर्म और अभी प्रकट हुआ कर्म, ऊपर से एक-से दिख सकते हैं, लेकिन उनके बनने का समय अलग है।
मनुष्य अनेक पुनर्जन्मों में एक ही गलती बार-बार दोहराता आया है, इसलिए वह बस लगातार प्रकट होने जैसा हो गया है।
इसलिए “मिटा नहीं” सोचना गलत है, यह बात है।
चेतना का विकास, अभी चाहा इसलिए तुरंत पूरा हो जाए ऐसी चीज़ नहीं है, बल्कि धैर्यवाले रोज़ के प्रयासों के अंत में, पता ही न चले कब, पक्के ढंग से साकार होती जाती है।
इस नियम को मन में गहराई तक उतारकर, “मिज़ुकारा” और “ओनोज़ुकारा” को एक करो।
तुम लोगों की चेतना, बिना एक भी अपवाद के, निश्चित रूप से गहरी हो रही है, दिव्य भी हो रही है, और विकास के मार्ग पर निश्चित रूप से आगे भी बढ़ रही है।
जैसे अँधेरी सुरंग में चलते हुए पता नहीं चलता कि कितना आगे बढ़े, वैसे ही कुछ लोगों को चेतना के विकास का अनुभव आसानी से न हो, लेकिन पक्के तथ्य के रूप में तुम लोग चेतना-विकास के महामार्ग पर आगे बढ़ रहे हो, इसलिए अपने पर और विश्वास करके, खुले मन से समय बिताकर देखो।
किसी दिन, किसी समय, अचानक चेतना की दृष्टि खुल जाएगी, और सारे बिंदु और बिंदु, बिंदु और रेखा, रेखा और रेखा जुड़ जाएँगे, और जीवन की पूरी तस्वीर याद आने का समय आएगा।
वह कब होगा यह पक्के तौर पर नहीं कह सकता, लेकिन वह निकट भविष्य में होगा, इसमें कोई संदेह नहीं।
इसलिए अपने पर विश्वास करके चलो।
क्योंकि उसी के आगे, सबका चमकता भविष्य खुलता जाता है।






