जैसी है वैसी दिव्यता को प्रकट करने के लिए
प्रकाशित अद्यतन
★आत्म-चेतना को अनुशासित करने का महत्व
जब सब कुछ समझ लेने जैसा भाव आ जाए, और लापरवाही या अहंकार सिर उठाए, तब थोड़ा रुककर खुद को फिर से देखना अच्छा है।
शरीर से चिपके आदत वाले विचार, थोड़ी-सी अच्छी बातें लगातार होने भर से फूल जाते हैं या ग़लतफ़हमी में पड़ जाते हैं, है न।
इसलिए तुम ऐसे न हो जाओ, इसके लिए हमेशा खुद को अनुशासित रखो।
खुद को अनुशासित न करो, तो जो बनना है वह भी नहीं बनता, और जो यथार्थ होना है वह भी यथार्थ नहीं होता।
और अपने आप का मार्गदर्शन करने वाला अपने सिवा कोई नहीं, यह तो समझ आता है न।
दूसरों पर निर्भर रहने की आदत हो, तो आसानी से दूसरों पर दोष डालने या खुद पर तरस खाने वाली भावना में ठहर जाते हो।
जिस अपने आप को प्यार से सँभालना है, वह दिव्यता वाला तन-मन है।
कभी भी वह अहं नहीं जो दिव्यता की ऊर्जा का ग़लत उपयोग करके तुम्हारा रूप धरे बैठा है, यह बात मन में अंकित कर लेनी चाहिए।
तुम लोगों में भी अभी भी कुछ ऐसे हैं जो अहं को ही अपना आप समझने की भूल कर रहे हैं।
अहं के विचार पिछले जन्मों से इस पल तक की रिकॉर्ड की हुई वीडियो हैं, और कभी भी तुम लोग खुद नहीं।
पिछले जन्मों की बुरी आदतें जिनकी नहीं छूटतीं, वे खुद उस रिकॉर्ड की हुई वीडियो का नायक बनकर, जीवन के मूल स्वरूप में स्थित दिव्य क्षेत्र की चेतना को सुला देते हैं।
इसीलिए कभी-कभी लगता है कि पीड़ा से आसानी से निकल नहीं पा रहे।
ऐसी चीज़ों को वस्तुनिष्ठ रूप से देखो, तो लग सकता है कि कितना समय बर्बाद करने वाला लंबा घुमावदार रास्ता है, लेकिन साथ ही यह भी मन में अंकित कर लो कि इस संसार में कुछ भी व्यर्थ नहीं।
सब कुछ अनिवार्यता वाली घटना है, और मिशन को पूर्णता से पूरा करने की प्रक्रिया है।
इसलिए चाहे कुछ भी हो जाए और चाहे कैसे भी विचार सताएँ, यह विश्वास रखो कि उस पीड़ा की गहराई में दिव्य-देह से निकलने वाली दिव्य क्षेत्र की चेतना है।
जीवन को प्रकाशित करने वाले जीवन के प्रकाश को जो स्वीकार करता है, वह ज़रूर उसी चेतना से अपना जीवन प्रकाशित करता जाता है। जिन्हें अभी वह प्रकाश महसूस नहीं होता, उन तक भी, जिस पल वे उसे स्वीकार करें, उसी पल से प्रकाश पहुँचने लगता है।

★पौधों की तरह जीवन के मूल स्रोत की ओर मुख करके बढ़ो
शुरू में कही गई लापरवाही और अहंकार, जिनमें मनुष्य आसानी से गिर जाता है, वे भी इसी अँधेरे विचार का एक प्रकार हैं।
और विचारों में सचमुच वज़न होता है, और वह जितना भारी होता है, चेतना में दिखने वाला अँधेरा उतना गहरा करता है।
दूसरे शब्दों में, सार्वभौमिक सत्य से जितना दूर हो, यह संसार उतना निराशाजनक दिखता है, और मनुष्य अपूर्ण अस्तित्व दिखता है।
और अपने और दूसरे, दोनों निकम्मे दिखें तो फिर भी ठीक, लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि केवल अपना आप ठीक दिखता है और केवल दूसरे निकम्मे।
मन का ऐसा झुकाव भी प्रकृति के नियम से एक दिन अपने सही रूप में लौट जाता है।
यही आज की बात की शुरुआत में कहे गए, खुद को अनुशासित करने की ज़रूरत से जुड़ता है।
जैसे पौधे सूर्य की ओर सीधे बढ़ने की कोशिश करते हैं, वैसे ही मानवता को जीवन के मूल स्रोत की ओर सीधे मुख करके, बीच में कोई अंतराल न रहे इतना एक होकर जीने की ओर उन्मुख होना चाहिए।
पौधे यह सोच-विचार करके नहीं करते, बल्कि जिस जीवन से वे जीवित रखे गए हैं उसे वैसा ही जीते हैं, और मानवता के लिए भी यही वांछनीय है कि तरह-तरह के सोच-विचार से परे होकर, जीवन के प्रकाश को वैसा ही प्रकट करके जिए।
ऐसा करो तो न लापरवाही रहती है न अहंकार, तुम जैसे हो वैसे अपने आप को ईमानदारी से देखकर, जैसा है वैसे जीवन में कूद सकते हो।
इसके लिए भी, चेतना को हमेशा स्थिर करके जियो।
ऐसा करने के लिए, रोज़ की साँस को गहरा करो।
यही सरल बात तुम्हारी चेतना को गहन ब्रह्मांड तक फैलाकर, जैसी है वैसी दिव्यता को प्रकट करने से जुड़ती है।
बस अमल करना है।
केवल इतना ही।






