बेहतर सामूहिक चेतना रचने के लिए (पूर्वार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
★नेतृत्व, संगठन-संचालन और सामूहिक चेतना का संबंध
अब तक के पृथ्वी-संसार में, आत्मा की श्रेष्ठता से कोई संबंध न रखते हुए भी ऊपर उठ सकने वाली कर्म की व्यवस्था ही मुख्य धारा थी, इसलिए अधिकतर अगुआ लोगों की मनोदशा देखता हूँ, तो उनमें ऐसे लोग अधिक थे जिनकी अहं की इच्छाएँ, अगुआ न होने वाले लोगों से भी अधिक प्रबल थीं।
वे अपनी उसी ज़िद की ताक़त से रास्ता बनाते और पद बनाते आए थे।
लेकिन अब से ऐसा नहीं होगा।
धीरे-धीरे ही सही, पूरी मानवता की चेतना दिव्य क्षेत्र के निकट पहुँचकर उसमें प्रवेश करती जाए, तो जो समष्टि के लिए निःस्वार्थ मन से सेवा कर सके वही दूसरों के ऊपर खड़ा होगा, और जो इसके उलट हो वह पीछे चलने वाले रूप में आता जाएगा।
स्पंदन-क्षेत्र के नियम के रूप में, ऐसा होना अनिवार्य हो जाता है।
इसलिए आज के युग के अगुआओं को देखकर, अपनी सुविधा के अनुसार सुबह कुछ और शाम कुछ, इस तरह वचन और कर्म बदल देने वाले, कभी दाईं ओर पलटने और कभी बाईं ओर मुड़ जाने वाले अगुआओं से बहुत अधिक उम्मीद न रखना ही अच्छा है।
हाँ, अगर तुम किसी से उम्मीद रखो और वह मनचाहा न हो, तब भी “यह व्यक्ति हमेशा अच्छा काम करता है, कितना आभारी हूँ” ऐसा सोच सकने वाली मनोदशा हो, तो बात अलग है।
आज के पृथ्वी-संसार में अधिकतर मामलों में, दूसरों से उम्मीद रखकर जब वह उम्मीद टूटती है, तब लगभग सब लोग निराशा या क्रोध के विचार भेजते हैं, है न।
ऐसा क्यों होता है, तो इसलिए कि वे अपनी सामर्थ्य उस व्यक्ति को सौंप चुके होते हैं।
जैसा हमेशा कहता हूँ, अपना भाग्य आख़िरकार वही व्यक्ति खुद रचता है।
फिर भी उसे किसी और को सौंपकर, “वह अच्छे से कर देगा” मानकर पूरी तरह छोड़ देते हैं, इसलिए जब मनचाहा नहीं होता, तो बात “ठीक से क्यों नहीं किया” तक पहुँच जाती है।
कठिन स्थिति तब है जब कोई संगठन से जुड़ा है पर उसके संचालन में सीधे शामिल नहीं, लेकिन संगठन जितना बड़ा होता है, उससे जुड़ी सामूहिक चेतना भी उसी अनुपात में बड़ी होती है, इसलिए यह महसूस करना कठिन होता है कि एक व्यक्ति की सोच पूरे की गति में सीधे प्रतिबिंबित हो रही है, है न।
ऐसे समय, जो संगठन-संचालन में सीधे शामिल नहीं, वह क्या करे, तो ऐसे ही समय जीवन में निहित अनंत प्रज्ञा को बाहर लाना अच्छा है।

“कब क्या करना चाहिए” जैसी बातें मूल रूप से, और कोई नहीं, स्वयं तुम ही जानते हो।
क्योंकि व्यक्ति का ठोस, उचित कर्म हर एक की स्थिति के अनुसार अलग-अलग होता है, इसलिए सामान्य बातें उस व्यक्ति पर पूरी तरह फ़िट बैठें, ऐसा कम ही होता है।
उदाहरण के लिए, देश, स्थानीय स्वशासन या सार्वजनिक संस्थाओं के बारे में जो सोचते हो, उसे राजनीति से अपने जुड़ाव के ढंग को आधार बनाकर सोचो।
आज पृथ्वी के बहुत से देशों में, चुनाव में अपनी सोच के निकट व्यक्ति को चुनकर उन्हें संचालन सौंपा जाता है, है न।
लेकिन वास्तव में, ज़रूरी नहीं कि तुम्हारा चुना व्यक्ति ही जीते, और जीत भी जाए तो और भी तरह-तरह के लोग जीतते हैं, और उनके बीच बहुमत से मतदान होकर तरह-तरह की बातें तय होती हैं, ऐसी व्यवस्था है।
इसलिए जब उम्मीद के मुताबिक़ न हो, तो इसे स्वीकार कर लेने के सिवा चारा नहीं।
और और भी जड़ से सोचें, तो कहा जा सकता है कि राजनीति उस देश या स्थानीय निकाय से जुड़े लोगों की स्थायी चेतना से तय होती है।
इसलिए सबकी चेतना स्वार्थी चेतना से परोपकारी मन तक ऊपर उठती जाए, इसके लिए सबसे पहले खुद से शुरू करके, हर पल के विचार, वचन और कर्म को परोपकार के भाव से चलाते जाना अच्छा है।
क्योंकि उस देश या स्थानीय निकाय का भाग्य वहाँ रहने वाले लोगों की सामूहिक चेतना रचती है, और हर व्यक्ति परोपकारी चेतना से जुड़ता जाए, तो कभी न कभी उस देश या स्थानीय निकाय का भाग्य ज़रूर अच्छा होता जाएगा। (अगली बार जारी)






