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दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

सामंजस्यपूर्ण भाग्य खींचने के रहस्य के बारे में (उत्तरार्ध)

प्रकाशित अद्यतन

​ इसी नाम का पिछला लेख

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(पिछली बार से जारी)

★मनुष्य भागीदार भी है और दर्शक भी, इस बारे में

अपने विचारों के ढर्रे को जानकर, उसे सोचते, कहते और करते अपने आप को वस्तुनिष्ठ रूप से देख सको, तो बस इतने से ही वही दोहराने वाले बीज (कारण) कम होते जाते हैं।

इसका अर्थ है, अपने आप को जानने की कोशिश करना अच्छा है।

यह कोई कठिन माँग नहीं है।

बस यह निहार सको कि तुम क्या सोचते हो, क्या कहते हो, क्या करके प्रकट करते हो, इतनी ही बात है।

इसके लिए, श्वास का धीमा और शांत होना वांछनीय है।

क्योंकि उथली श्वास वाला व्यक्ति, जिसे “मैं” मान बैठा है उन विचारों से चिपका रहता है, इसलिए अपने आप को वस्तुनिष्ठ रूप से नहीं निहार पाता।

श्वास को धीमा और शांत करो, तो मनुष्य व्यक्तिगत स्व से अलग हो सकता है।

मनुष्य का सत्य यह है कि वह भागीदार होते हुए भी, दर्शक भी है।

अपने आप को देखने वाला स्व अपनी गहराई में है।

श्वास धीमी रखो, तो उस गहरे स्व के रूप में रह सकने का समय बढ़ता है।

और गहरी श्वास लेते रहो, तो गहराई से सतही चेतना की ओर हाथ बढ़ा रहा स्व, और सतही चेतना से जीवन की गहराई में लौटने की कोशिश कर रहा स्व, मिलकर एक हो जाने का समय आता है।

★सब कुछ पहचानने के ढंग पर ही निर्भर है

सामंजस्यपूर्ण भाग्य, सामंजस्यपूर्ण मन में फैलता है, इसलिए किसी भी और बात से पहले, मन को सामंजस्य में लाने की ओर बढ़ना अच्छा है।

इसके लिए, अभी बताए गए अपने विचारों की प्रवृत्ति को देख सकने लगो तो अच्छा है।

ऐसा होने पर, समझ आने लगता है कि जीवन का सब कुछ तुमने ख़ुद रचा था, इसलिए किसी भी भाग्य के प्रति, मन पीड़ित नहीं होता।

पीड़ा रहित चेतना में बिताया समय, और पीड़ा में सने हुए बिताया समय, इनमें से किसमें रचनात्मक चेतना में रह सकते हो, क्या लगता है?

कहने की ज़रूरत ही नहीं न।

इसलिए पहले, अपने आप को जैसा है वैसा देख सकने का लक्ष्य रखो।

उसके आगे, रचनात्मक भविष्य आसानी से बनाया जा सकने वाला समय फैला है।

पीड़ा, जीवन के मूल स्वरूप और अपनी चेतना के अलग होने की जगह पैदा होती है, इसलिए अपनी चेतना को, जीवन के केंद्र के और क़रीब लाने वाले ढंग से समय बिताओ।

ऐसा करो तो, किसी भी स्थिति को पार कर सकने वाला ज्ञान उमड़ आता है, और वास्तव में भाग्य का रास्ता खोला जा सकता है।

वह जैसा हमेशा कहते हैं, सोचो कि कर सकते हो तो कर सकते हो, सोचो कि नहीं कर सकते तो नहीं कर सकते।

मनुष्य केवल पहचानने के ढंग से, ज़मीन-आसमान के अंतर वाला भविष्य रच रहा है।

इसलिए, अगर मनचाहा भविष्य पक्के तौर पर बनाना चाहते हो, तो आगे की ओर देखने वाली चेतना के साथ, कैसी भी कठिनाई के बीच हो, हिम्मत हारे बिना बढ़ो।

ऐसा करो तो तुम, निश्चित रूप से उज्ज्वल भविष्य जी रहे होगे। (समाप्त)

 

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

वीडियो जल्द आ रहे हैं

वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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