सामंजस्यपूर्ण भाग्य चित्रित करने के रहस्य के बारे में (पूर्वार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
★सोच के अनुसार चित्रित किया जा रहा भाग्य
मानवता का हर एक व्यक्ति, बिना किसी अपवाद के, वैसा ही जीवन जी रहा है जैसा उसने सोचा।
ज़रूरी नहीं कि वह इच्छा के अनुसार जीवन हो।
लेकिन मनचाहा न होने वाली बातों समेत, वह सोच के अनुसार चित्रित किया गया भाग्य है।
यह समझ आ जाए, तो चेतना का कैसे उपयोग करें, इसकी दिशा दिखने लगती है, इसलिए हर कोई बिना पीड़ा के जी सकता है।
यह बात कैसे समझाऊँ, यह सोचकर हमेशा शब्द बदल-बदलकर कहता हूँ, लेकिन आख़िरकार हमेशा एक ही बात दोहरा रहा होता हूँ।
चेतना ही सब कुछ का सब कुछ है।
उदाहरण के लिए, हम्म, पृथ्वी के लोग, सब के सब, आपस में मेल से नहीं रह पाते, है न।
ऐसा क्यों है, तो इसलिए कि कोई किसी को शत्रु मानता है, इसलिए बस ऐसा दिखता है कि शत्रुता रखने वाला सामने वाला है।
सुनो, यह बहुत ही महत्वपूर्ण बात है, इसलिए इसे जप के शब्दों की तरह बार-बार दोहराकर, चेतना की जड़ तक उतार लो।
फिर से कहता हूँ।
शत्रु मानते हो, इसलिए शत्रु बनता है।
अगर तुम शत्रु को स्वीकार न करो, तो वह व्यक्ति अजेय है, चारों दिशाओं में कहीं भी शत्रु जैसा कोई अस्तित्व नहीं, और वह सबके साथ सामंजस्य में रह सकता है।
लेकिन अगर शत्रु को स्वीकार कर लो, तो शुरुआती चरण में सामने वाले में कोई बुरी नीयत या नुक़सान पहुँचाने का इरादा न होते हुए भी, तुम उसे शत्रु ठहराकर, उस बोध वाले विचार को बड़ा करते जाते हो, जिससे एक दिन वह उसमें भी फैल जाता है, और सामने वाला भी तुम्हें शत्रु मानने लगता है, और इस तरह ग़लतफ़हमी या टकराव वाली स्थिति रच ली जाती है।

★बोध द्वारा रचे जा रहे भाग्य को जानो
अगर तुम किसी को शत्रु न मानो, तो उस व्यक्ति के कोई शत्रु नहीं।
फिर भी दूसरों को शत्रु की नज़र से क्यों देख लेते हो?
हम इसका उत्तर जितना चाहो बता सकते हैं।
लेकिन हम सही स्थिति-बोध के लिए कितनी भी सामग्री दें, उसे कैसे लेना है और कैसे समझना है, यह तुम लोगों के अपनी ज़िम्मेदारी पर लिए गए निर्णय और अमल पर छोड़ा गया है, इसलिए तुम लोग क्या और कैसे सोचो, यह हम थोप नहीं सकते।
मान लो, हम ज़बरदस्ती तुम्हारी चेतना को बलपूर्वक बदल दें, तो क्या होगा, सोचते हो?
वह तुम्हारी इच्छा से बिल्कुल असंबद्ध, दूसरे द्वारा मरोड़ा गया बोध होगा, इसलिए कुछ समय में पहले वाली अवस्था में लौटने की प्रतिक्रिया वाले विचार उठेंगे, और तुम्हें फिर से पुरानी हालत में खींच ले जाएँगे।
इसलिए आख़िरकार, मनुष्य खुद बदलकर ही चेतना का विकास पूरा कर सकता है।
यह न समझने के कारण ही सब लोग उलझन और पीड़ा के चींटी-जाल में चढ़ते और गिरते, एक ही बात दोहराते हुए जीते आए।
तो उस अवस्था से निकलने के लिए महत्वपूर्ण है, शांति और विवेक से अपने विचारों के रुझान और पैटर्न को देखकर जानना।
मैं कैसा मनुष्य हूँ।
मेरे प्रतिक्रिया के कैसे पैटर्न हैं, और मैं कैसी सहज प्रतिक्रियाएँ दोहराता आया हूँ।
ऐसी वस्तुनिष्ठ आत्म-पहचान से ही वहाँ से निकलने का पहला कदम शुरू होता है। (अगली बार जारी)






