सामंजस्यपूर्ण नियति को कुशलता से ओवरराइट करके पृथ्वी पर महान सामंजस्य की नियति चित्रित करने के लिए (पूर्वार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
★नियति हमेशा ओवरराइट होकर सुरक्षित होती रहती है
नियति हमेशा मनुष्य के विचार-कर्म के परिणाम के रूप में प्रकट हुई घटना है न?
यह क्षेत्र, राष्ट्र, पूरे संसार तक नियति देखने का दायरा बढ़ाने पर भी, सब एक ही नियम से चलता है।
और नियति हमेशा ओवरराइट होकर सुरक्षित होती जाने वाली चीज़ है, इसलिए परसों बनाई बुरी नियति कल के सत्कर्म से फिर से लिख भी दी जाए, अगर आज फिर बुरी नियति का मूल बनने वाला विचार-कर्म कर बैठो, तो वही नवीनतम भविष्य-नियति के रूप में दर्ज हो जाता है।
इसीलिए कहता हूँ कि बारीक भविष्य कुछ भी तय नहीं है।
भविष्यवाणी के नाम पर तरह-तरह की बातें कही जाती हैं, लेकिन उन्हें आधी बात मानकर लेना पर्याप्त है।
“आधी बात” इसलिए कि जब तक पृथ्वीवासियों की चेतना दिव्य क्षेत्र में प्रवेश नहीं करती, तब तक भविष्य की संभावना सुख और दुःख दोनों की है, और उसकी संभाव्यता हर क्षण मानवता के छोड़े विचार-कर्म के अनुसार अच्छे-बुरे में पल-पल पलटती रहती है, स्थापित नहीं है।
★नियति जहाँ दर्ज होती है उस स्थान की बात
वैसे, याद है पहले की बात कि नियति जहाँ दर्ज होती है वह स्पंदन-क्षेत्र आयाम की गहराई में कई हैं, किसी एक निश्चित जगह पर नहीं?
मोटे तौर पर बुरी नियति सूक्ष्म लोक के स्पंदन-क्षेत्र में दर्ज होती है, और वह भौतिक मनुष्य के चेतना-स्तर के सबसे निकट के स्पंदन-क्षेत्र में है, इसलिए वहाँ अँधेरी भविष्य-तस्वीर भी दर्ज है।
और न अच्छी न बुरी जैसी बीच की नियति आत्मिक लोक के निचले भाग के स्पंदन-क्षेत्र में दर्ज होती है।
और अच्छा भविष्य, सुखी भविष्य, सामंजस्यपूर्ण भविष्य आत्मिक लोक के ऊपरी भाग या देवलोक के स्पंदन-क्षेत्र में दर्ज है, और मानवता के उस स्पंदन-क्षेत्र से मेल खाती चेतना से किए विचार-कर्म का परिणाम इस संसार में दर्ज होता है, और वह भविष्य की नियति के रूप में प्रकट होता है।
केवल स्थूल स्पंदन के आयाम में दर्ज भविष्य-तस्वीरों की ही बात हो, तो अँधेरी बातें फैलकर लोगों की चिंता बढ़ जाती है।

★सूक्ष्म देह के स्पंदन-क्षेत्र और भौतिक मनुष्य के वचन-कर्म-व्यवहार का संबंध
तो, जिस सूक्ष्म लोक के स्पंदन-क्षेत्र में बुरी भविष्य-तस्वीर दर्ज है, वहाँ, संख्या काफ़ी घट गई है, लेकिन आज भी चेतना का विकास न किए मृत्यु-पश्चात चेतना-पिंड भटक रहे हैं।
क्योंकि शरीर छोड़ने पर भी भटकने वाले चेतना-स्तर के लोग एक के बाद एक वहाँ स्थानांतरित होते आते हैं।
वे शरीरधारी लोगों के सूक्ष्म देह के स्पंदन-क्षेत्र में जीते हैं, और जब इस दुनिया में उनसे स्पंदन मिलने वाले भौतिक विचार हों और उनके विचार-स्पंदन से प्रतिध्वनित होकर समस्वरता की घटना हो, तब उनकी अधूरी इच्छाएँ उस भौतिक मनुष्य के ज़रिए पूरी करने की कोशिश होती है।
इसलिए, सूक्ष्म लोक के स्पंदन-क्षेत्र में दर्ज अँधेरे भविष्य से मन समस्वर हो जाए, तो सूक्ष्म लोक के विचारों में खिंचकर, अपने मूल स्वभाव से अलग कर्म कर बैठना होता है।
इसका अर्थ है कि विवेक की लगाम छूटकर, सामान्य जीवन-शैली से कल्पना भी न कर सकने वाली घटना कर बैठना हो सकता है, और दुनिया में हलचल मचाने वाली असामंजस्यपूर्ण घटनाओं की पृष्ठभूमि में, सब नहीं कहूँगा, लेकिन ऐसी परिस्थितियाँ छिपी होती हैं। हालाँकि यह दुर्घटना या घटना में फँसे व्यक्ति को दोष देने की बात नहीं है।
भौतिक मनुष्य सूक्ष्म लोक की गूँज से क्यों आसानी से प्रतिक्रिया करता है, इसे अधिकांश लोग समझते होंगे, लेकिन न समझने वालों के लिए बता दूँ, क्योंकि यह वह संसार है जहाँ इस दुनिया के दुःख से भरी चेतना लिए मरे लोग स्थानांतरित होते हैं।
इसलिए सूक्ष्म लोक, आयाम के अंतर की परवाह किए बिना, दिव्य चेतना से दूर के विचार-स्पंदन के संचय का स्थान बना हुआ है।
ऐसी बातें अब तक केवल हल्के से बताई थीं, लेकिन अब आखिरकार तुम खुद ऐसे स्पंदन-क्षेत्र के अशुद्ध विचार-समूहों को पूरी तरह शुद्ध करने की शक्ति पा चुके हो, इसलिए आगे से स्पष्ट रूप से बताऊँगा। (अगली बार जारी)






