इस लोक से जुड़े उस लोक की शांति को भी साथ-साथ साकार करने के लिए (2/4)
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इसी नाम का पिछला लेख
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(पिछली बार से जारी)
★उस लोक और इस लोक का एक-दूसरे पर गहरा प्रभाव है
उनके पूर्वाग्रह बहुत गहरे हैं, इसलिए संरक्षक देवता और आत्माएँ उन्हें उजले संसार में ऊपर उठाने के लिए कितनी भी बार खींचकर ऊपर लाएँ, वे अपनी इच्छा से हर बार फिर, मानो भागते हुए, पीड़ा-लोक में कूदकर वापस लौट जाते हैं।
और उसकी गूँज, उनके वंशज यानी तुम लोगों के भाग्य पर भी बुरा असर डालती है।
कुछ मामलों में वह सीधे आत्मिक बाधा के रूप में असर डालती है, लेकिन ज़्यादातर मामलों में, उजली न होने वाली विचार-आदतों के रूप में असर डालती है।
यह बात पढ़ने वाले लोगों जैसों के उस लोक में रहने वाले रिश्तेदार और परिचित, तुम लोगों के भौतिक लोक में चेतना का विकास करने के उपकार से पीड़ा-लोक की सीख से आगे बढ़कर, अभी प्रकाश से चमकते संसार में पृथ्वी-लोक के उद्धार के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन अगर वंशज यानी आज की मानवता का चेतना-स्तर भटकाव के संसार में हो, तो आम तौर पर पूर्वजों की स्थिति भी पीड़ा-लोक में छटपटाने वाली होती है, ऐसे बहुत लोग हैं।
इसीलिए, ऐसे सभी लोगों को ऊपर उठाने के लिए, बोधिसत्व जैसा दायित्व लेकर खड़े होकर, इस जीवन में जन्मे तुम लोगों जैसे लोग, जब चेतना-स्तर एक हद तक बढ़ जाए, तो ऐसे संसार के होने को भी जानकर, और नज़र हटाए बिना सीधे देखकर, भटकते लोगों को ऊपर उठाओ।
उस लोक की बात उस लोक की, इस लोक की बात इस लोक की, ऐसे अलग-अलग और असंबंधित होते तो बात अलग थी, लेकिन व्यक्ति का भाग्य भी और पूरी पृथ्वी का भाग्य भी, हर स्तर पर गहराई से जुड़कर एक-दूसरे पर असर डालते हैं।
और भौतिक लोक के पास वाले भटकाव के संसार का स्पंदन, ख़ासकर आज की मानवता पर आसानी से असर डालता है।

क्योंकि पृथ्वी की बहुत सी मानवता, भौतिक शरीर में रहते हुए भी आत्मा से पीड़ा-लोक में जी रही है। (स्पंदन के मेल खाने वाले लोग एक-दूसरे के साथ गूँजते हैं, यही बात है)
इसीलिए, उस लोक में भटक रहे लोगों का आचरण इस लोक के भाग्य को भी प्रभावित करता है, इस तथ्य का एक अंश भी जान सको, तो हर किसी को सँभलकर, मर्यादा से जीना ही पड़ेगा।
कोई व्यक्ति कितना भी, “मेरा समग्र को पीछे खींचने का ज़रा भी इरादा नहीं, और मैं ऐसा करता भी नहीं” मानकर ज़ोर देकर कहे, अपने सिर पर बैठी मक्खी न उड़ा पाए तो, अनजाने में पृथ्वी के भविष्य पर भी छाया डाल सकता है।
सिर पर बैठी मक्खी का अर्थ है, अपने भावनात्मक विचार।
दिव्य चेतना की अभिव्यक्ति यानी विवेक और बुद्धि से, अहं पर आधारित सुख-दुख-क्रोध-हर्ष को नियंत्रित न कर पाने तक, चेतना-स्तर अक्सर सूक्ष्म लोक के स्पंदन-क्षेत्र के क़रीब होता है।
लेकिन यह, हर किसी के गुज़रने वाला रास्ता है।
वे पीड़ा-लोक, कितनी भी बार कहें, केवल मरने के बाद जाने वाले संसार नहीं हैं।
भौतिक शरीर में जीते हुए भी, अगर चेतना का स्थायी आयाम उन संसारों में हो, तो वह व्यक्ति सूक्ष्म लोक, नरक-लोक या अंधकार-लोक आदि का निवासी कहा जा सकता है।
इसलिए पहले कई बार बताया है, कि तुम लोगों के शब्दों में “यह लोक”, हर आयामी स्तर के निवासियों के एक जगह इकट्ठा होने वाला [चेतना की विश्व-प्रदर्शनी का मैदान] है। (अगली बार जारी)






