दिव्यता के पुनर्जागरण की लहर को क्रांतिक द्रव्यमान बिंदु तक ले चलें (पूर्वार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
★तुम लोगों द्वारा रचा गया दिव्यता के पुनर्जागरण का ज्वार-मोड़
तुम लोगों के अभी पृथ्वी पर होने से, पृथ्वी की कितनी मानवता का उद्धार हो रहा है, यह जानते हो?
पृथ्वी-लोक में चेतना के विकास की नई हवा फूँककर, लोगों के मन को भीतर बसी दिव्यता की ओर सीधा मोड़ने वाली धारा का ज्वार-मोड़ बनाने वाले कोई और नहीं, तुम लोग ही हो।
क्योंकि तुम लोगों ने पिछले 50 से अधिक वर्षों में, जहाँ कोई रास्ता नहीं था वहाँ रास्ता बनाया और उसे इतना सँवारा कि मानवता उस पर चल सके, इसीलिए 2018 आज संसार के अनेक देशों में जगह-जगह, न्यू एज जैसे शब्दों से वर्णित किए जाने वाले, पुराने दर्शन और धार्मिक विचारों से न बँधने वाली नई आध्यात्मिक सभ्यता के अंकुर उभर आए हैं।
तुम लोगों के ऐसे काम को एक शब्द में कहें तो वह दर्पण ही है।
वह मानवता के सत्य को दिखाने वाला दर्पण है।
तुम लोग अपनी दिव्यता को जितना चमकाते हो, उसी अनुपात में, सहृदय पृथ्वी की मानवता जीवन के रहस्य की ओर अपने मन की आँखें लगा रही है, और वहाँ से आगे पवित्र जीवन-ढंग की ओर उन्मुख होती जा रही है।
अब तक को देखें, तो कहा जा सकता है कि इसने काफ़ी बड़ी सफलता पाई है।
इसलिए फिर से कहता हूँ, “तुम लोगों को हर दिन जो करना है, वह दूसरों को ही बदलना नहीं है, बल्कि अपने द्वारा पहचानी गई मानवता की छवि को दिव्य अस्तित्व के रूप में प्रतिबिंबित करना है (सारी मानवता के सार को हृदय की गहराई से दिव्य अस्तित्व के रूप में पहचानना)”, यही करने योग्य सबसे महत्वपूर्ण काम है।

यही तुम लोगों के प्रार्थनामय हृदय और कर्म के सिद्धांत का सार है।
कहा जा सकता है कि तुम लोगों के रोज़ के विचार, वचन और कर्म, आम दुनिया के लोगों की तरह बुरी चीज़ को पहचानकर उसे अच्छा बनाने का प्रयास नहीं हैं, बल्कि मूल रूप से अच्छे स्वभाव वाली मानवता के सार को प्रार्थना के स्पंदन वाले कोतोदामा से गुँजाकर, संसार की मानवता के हृदय की गहराई में सोई दिव्यता को जगाना है।
ऐसा करके तुम “पृथ्वी की मानवता के हर एक व्यक्ति की चेतना में दिव्य बनने की तरंग उठाने वाली लहर” रच रहे हो।
इसका अर्थ है कि पृथ्वी के हर व्यक्ति द्वारा छोड़ी जाने वाली चेतना का आयाम और कोण, ऐसे ढंग में बदल जाता है जिससे वह अपने जीवन की गहराई में दिव्यता की चमक खोज ले।
तुम लोग सारी मानवता को दिव्य अस्तित्व के रूप में देखकर, मन के दर्पण में मानवता के मूल स्वरूप को जितना प्रतिबिंबित करते हो (जितना पहचानते हो), उतना ही लोग, बिना किसी के ज़बरदस्ती किए, बिल्कुल स्वाभाविक मन के बदलाव के रूप में, हर कोई जीवन की गहराई से आने वाली अनुभूति के सहारे अपनी दिव्यता को फिर से जगाने लगते हैं।
यही मनुष्य का असली होने योग्य रूप है। (अगली बार जारी)






