तीसरे आयाम की यात्रा के अंतिम चरण में (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
इसी नाम का पिछला लेख
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(पिछली बार से जारी)
★और भी विशाल जीवन के महान स्व के साथ एक होने के लिए
उस समय, स्वयं को विशाल महासागर मानकर कल्पना करते हुए करना अच्छा है।
कहा जाता है कि पृथ्वी पर रूप वाला जीवन समुद्र से जन्मा, यह तथ्य है, और तुम अपनी श्वास की ध्वनि (नाक के भीतर गूँजने वाली लहरों की आवाज़) के साथ एकाकार होने का अनुभव करो, तो उस समय तुम्हारी चेतना यह पहचान सकेगी कि तुम स्वयं ही जीवन का वह घर थे जो सब कुछ को जन्म देता और जीवित रखता है।
रूप वाले सभी जीवन का माता-पिता तुम स्वयं ही अगर उफन पड़ो, तो बहुत से जीवन को भारी नुकसान पहुँचाओगे न।
तो, मनुष्य को केवल भौतिक व्यक्ति के रूप में देखें तो, उसमें 60 से 70 लाख करोड़ भौतिक (पदार्थ) कोशिकाएँ हैं न।
लेकिन उनके अलावा भी, अनगिनत मानसिक कोशिकाएँ तुम्हारी चेतना को बनाती हैं।
इस तथ्य से यह कहा जा सकता है कि तुम, तुम्हें बनाने वाली सभी भौतिक कोशिकाओं और मानसिक कोशिकाओं के जीवन के माता-पिता हो।
ऐसी अपनी चेतना अगर उफन रही हो, तो वे सारी कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त होंगी, सामान्य चयापचय का चक्र बिगड़ जाएगा, और मन-शरीर को नुकसान भी हो सकता है।
और तुम, तुम्हें बनाने वाली कोशिकाओं की ओर के एक व्यक्ति होने के साथ-साथ, कोशिकाओं के लिए स्वयं पृथ्वी और ब्रह्मांड भी हो।
तो, “ऐसा नहीं, वैसा नहीं” सोचने के बजाय, धीमी, शांत श्वास जारी रखो, तो [ब्रह्मांड – पृथ्वी – प्रकृति – सभी प्राणी – मानवता – भौतिक शरीर के रूप में स्वयं – मन के रूप में स्वयं] ये सात, मोबियस पट्टी की तरह आपस में जुड़कर, एक ही जीवन का विशाल प्रकाश-चक्र हैं, ऐसा अनुभव होने लगता है।
ऐसा होने पर, चेतना अपने छोटे-से खोल से बाहर निकलकर, और भी विशाल अस्तित्व की चेतना से, पृथ्वी और पृथ्वी पर रहने वाले सब कुछ को निहारते स्वयं का बोध होने लगता है।

★पुरानी यात्रा का अंत = नई यात्रा की शुरुआत पर
चेतना वहाँ तक फैल जाए तो फिर कोई समस्या नहीं।
तुम्हें कुछ भी हानि नहीं पहुँचा सकता।
क्योंकि तुम्हारी चेतना पृथ्वी के साथ एक है, और स्वयं ब्रह्मांड भी है।
और वह, मूल रूप से मौजूद जीवन-प्रकाश में जड़ें जमाए दिव्य चेतना भी है।
बल्कि, असल में तुम्हें हानि पहुँचाने वाली चीज़ तो, केवल तुम्हारे छोड़े हुए आदतन विचार (व्यक्तिगत स्व) ही थे, ब्रह्मांडीय चेतना (जीवन का प्रकाश) के रूप में तुम (जीवन-स्व) नहीं, इसलिए अब जब चेतना पृथ्वी जितनी, ब्रह्मांड जितनी बड़ी, गहरी और व्यापक हो गई है, तो इस चरण में तुम्हें हानि पहुँचाने वाली कोई भी चीज़, अब बिल्कुल नहीं रही।
अतीत की स्मृतियों और आदतन विचारों के बारे में, “ये मेरा सच्चा स्व नहीं थे” यह ध्यान देकर, दृढ़ता से पहचान सको, तो फिर उसी विषय की पूरक परीक्षा जैसे भाग्य-परिवेश का बार-बार अनुभव करने की ज़रूरत नहीं रहती।
बधाई हो।
यहाँ तक बहुत अच्छे से आए।
कठिन रहा होगा न।
लेकिन अब सब ठीक है।
अपूर्ण चेतना से असुविधा को पहचानते आए समय का सिलसिला अब अंत के क़रीब है।
तुम्हें असुविधा वाले मंच से बाँधे रखने वाली पुरानी विचार-आदतें पूरी तरह शुद्ध हो जाएँ, तो पिछले जन्मों के पार से चली आ रही अब तक की मन की यात्रा समाप्त हो जाएगी।
चारों ओर केवल भ्रम की रेत वाले रेगिस्तान (पुरानी विचार-आदतें) में भटकते हुए, हीरे (दिव्य स्व) की खान खोजते रहना, बहुत कठिनाई भरा था न।
और आज तक चली आ रही लंबी यात्रा के समाप्त होने के उस क्षण, तुम्हारी चेतना तुरंत उसी स्थान पर नए मंच पर पहुँच जाएगी, और पूरी तरह नए जन्म लिए सच्चे स्व की चेतना से नई यात्रा शुरू होगी।
वह समय अब बिल्कुल पास आ चुका है।
इसलिए अभी कितना भी कठिन हो, हार मत मानो।
एक कदम या दो कदम ही सही, आगे बढ़ो।
दिखावा करके, ख़ुद को चतुर दिखाने के बारे में सोचने की ज़रूरत नहीं।
जब मन थककर चल न सके, तो थोड़ा-थोड़ा ही सही, अपनी गति से आगे बढ़ना काफ़ी है।
अतीत की स्मृतियों वाले स्व से, दिव्य चेतना वाले स्व की ओर मोड़ के बिंदु का, तुम बहुत जल्द अनुभव करोगे।
बिना किसी संदेह के, निश्चित रूप से। (समाप्त)






