अब जागने वाले, ग्रहों के विकास के विशेषज्ञों के नाम
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तुम लोगों का सत्य
हर युग में, जब भी कोई नया ग्रह बनता है, दिव्य-आत्मा सभ्यता पूरी कर चुके विकसित ग्रहों से दायित्व लेकर आए लोग सबसे पहले वहाँ स्थानांतरित होते हैं।
उस समय सबसे पहले वे उस ग्रह के देवलोक में बसते हैं, और वहाँ से आगे और खुरदरे स्पंदन वाले संसारों का विकास करते जाते हैं।
देवलोक के ऊपरी स्तर से मध्य, मध्य से निचले, देवलोक के निचले स्तर से आत्मिक लोक के ऊपरी, ऊपरी से मध्य, मध्य से निचले, आत्मिक लोक के निचले स्तर से सूक्ष्म लोक के ऊपरी, ऊपरी से मध्य, मध्य से निचले, और अंत में स्पंदन-क्षेत्रों के विकास के अंतिम गंतव्य, यानी भौतिक जगत तक।
इस बीच, समुद्र, पर्वत, वायु, पौधे, जानवर जैसी प्रकृति और सब जीवित प्राणियों का संचालन करने वाले देवता भौतिक जगत की तैयारी करते जाते हैं।
उस ग्रह की तरंग-लंबाई से मेल खाए, इसके लिए जल, वायुमंडल और खनिजों को समायोजित करते हैं, और जीवों के DNA को छूते हुए उस ग्रह के लिए बिल्कुल उपयुक्त शरीर बनाते जाते हैं।
यह मानवता के जन्म से पहले का वह संसार है जिसके बारे में तुम लोगों ने भी पढ़ा है।
पृथ्वी पर भी कई बार फिर से शुरुआत के बाद, जब आख़िरकार मानवता का स्वागत कर सकने का समय और मानवता के देवलोक से भौतिक जगत तक स्पंदन का विकास पूरा करने का समय मेल खा गए, तब आत्मिक देह के स्पंदन को अधिकतम खुरदरा करके आदि मानव “इस संसार” में प्रकट हुए।
संसार के कई स्थानों पर, इस तरह आत्मिक रूप से प्रकट हुए आदि मानव हैं।
तुम लोगों का सत्य यह है कि तुम शुक्र ग्रह से आई ब्रह्मांडीय मानवता थे।
बेशक, जैसा आम तौर पर बताया जाता है, लंबे विकास-मार्ग से गुज़रकर आज के रूप तक पहुँचने वाली धारा भी है।
लेकिन कौन कहाँ से आया, इस आधार पर लोगों को बाँटकर देखने की ज़रा भी ज़रूरत नहीं। क्योंकि जीवन का सार सबका एक ही है। जब दूसरे ग्रहों पर इस्तेमाल होने वाला विकसित विज्ञान पृथ्वी पर इस्तेमाल हो सकेगा, तब सब सत्य साधारण तथ्य के रूप में स्पष्ट हो जाएँगे, इसलिए अभी जल्दी में जानने की ज़रूरत भी नहीं।

ग्रह का विकास क्या है
तो, अब आज की बात का मुख्य विषय।
मानवता के लिए ग्रह का विकास, जैसा अभी बताया, वह यात्रा है जिसमें दूसरे ग्रहों से आई दिव्य-आत्मिक मानवता खुरदरे स्पंदन वाले संसारों का विकास करती जाती है, सबसे खुरदरे स्पंदन वाले संसार में महान सामंजस्य वाला संसार बनाती है, और फिर “जीवन के मूल स्रोत” में लौट जाती है।
इस अर्थ में आज की पृथ्वी मोड़ का बिंदु पार कर चुकी है, आत्मिकता का विकास भी पूरा कर चुकी है, और दिव्यता को फिर से जगाने के चरण तक आ गई है।
पृथ्वी महान सामंजस्य वाला ग्रह बन सकेगी या नहीं, यह पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे, सब तरह से इस पर निर्भर है कि पृथ्वी की मानवता के मन में पवित्र चेतना फिर से जागती है या नहीं।
अभी पृथ्वी-जगत का भाग्य बहुत महत्वपूर्ण दोराहे पर है, और हर एक दिन सचमुच कीमती समय है।
लेकिन सारी मानवता के जीवन का सार याद करने का समय ज़रूर आएगा।
क्योंकि अतीत में बहुत से ग्रहों को पूर्ण कर चुके अनुभव वाले तुम लोग धरती पर हो।
तुम लोगों का सच्चा रूप है, सही युग में सही स्थान पर जैसे होना था वैसे प्रकट हुए पृथ्वी के उद्धारक।
धीरे-धीरे तुम लोग अभी यह बोध गहरा करते आ रहे हो, है न।
अभी बस यह बोध गहरा करना ही काफ़ी है।
तब ज़रूर, तुम लोगों के आसपास से संसार बदलने लगेगा।
इसलिए निश्चिंत होकर, सब अस्तित्वों में दिव्यता को स्वीकार करते रहो, यही चाहता हूँ।
कुछ समय में, ऐसी आश्चर्यजनक घटनाएँ होंगी कि हर किसी का मुँह खुला का खुला रह जाएगा, और देखते-देखते सब कुछ महान सामंजस्य में आ जाएगा।







