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दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

असली अपनी धुरी क्या है?

प्रकाशित अद्यतन

क्या तुम अपने को ऐसा पाल रहे हो कि आसपास के लोग सोचे बिना न रह सकें, “मैं उस व्यक्ति की तरह जीना चाहता हूँ”?

लेकिन वह, दूसरों की नज़रों की चिंता करते हुए “क्या मैं सही जी रहा हूँ” सोचकर डरी-सहमी मनःस्थिति नहीं है।

वह है, किसी भी बात, किसी भी चीज़ से प्रभावित न होने वाली, असली अपनी धुरी रखकर जीना।

ऐसे जियो, तो अपने-आप जीवन की मूल अपनी धुरी को जी सकते हो।

मन में सच्ची अपनी धुरी स्थापित हो जाए, तो मनुष्य किसी की भी कैसी भी प्रतिक्रिया पर मन से नहीं डगमगाता, है न।

दूसरों की नज़रों की चिंता करके, अपने असली रूप को छिपाने की भी ज़रूरत नहीं रहती।

वह, “जैसा दिखता है” के “जैसा वास्तव में है” में समा जाने का रूप है।

ऐसा हो जाए, तो मनुष्य, जैसे सूर्य बिना भेदभाव के महान प्रकाश बिखेरता है, वैसे ही अपने-आप चमकते हुए जी सकता है।

भीतर से देखने वाला व्यापक दृष्टि वाला स्व, और सतह पर रहकर देखा जाने वाला सीमित स्व।

तुम्हारी चेतना किसमें है?

अगर दोनों को ऊपर से देख पा रहे हो, तो असली अपनी धुरी पकड़ ली, ऐसा ही समझो।

क्योंकि वह, एक साथ मौजूद सृष्ट की चेतना और रचयिता की चेतना, दोनों को हथेली पर रखकर, समग्र रूप से देखने वाली चेतना है।

 

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

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वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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