परिवर्तित चेतना-अवस्था को पार करके जीवन का सत्य प्रकट करने का तरीका (उत्तरार्ध)
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(पिछली बार से जारी)
★अलौकिक क्षमताएँ दिव्य चेतना के विकास के बाद अपने-आप आ जाती हैं
तो, यहाँ हम तुम लोगों को साफ़-साफ़ बताना चाहते हैं कि अतींद्रिय शक्ति और आत्मिक शक्ति, चेतना के विकास की प्रक्रिया में, व्यवहार में उतनी महत्वपूर्ण चीज़ें नहीं हैं।
वे तो दिव्य चेतना के विकसित हो जाने के बाद, ज़रूरत के अनुसार जितनी चाहो उतनी सहजता से उपयोग में आने लगती हैं।
इसका अर्थ है कि दिव्य चेतना के विकास के बाद उपयोग में आने वाली अतींद्रिय शक्ति और आत्मिक शक्ति ही असली हैं।
उससे पहले ही जल्दबाज़ी में उन क्षमताओं को विकसित करने की कोशिश करो, तो अक्सर राह से भटककर सूक्ष्म लोक के विचारों के हाथों नाचने लगते हो।
जो लोग उस दिशा में कदम बढ़ाते हैं, वे अक्सर मन के किसी कोने में अतृप्ति का भाव लिए रहते हैं, और इसीलिए दूसरों में न होने वाली ज़बरदस्त शक्ति पाकर लोगों से मान्यता पाना चाहते हैं।
ऐसे लोग सत्य को उलटा खड़े होकर देखते हैं, इसलिए ज़्यादातर असत्य को सत्य समझने की भूल करते हैं।
इसलिए हम, ताकि तुम लोग ऐसे न बनो, साधारण साँस को धीमा और आरामदायक करके, परिवर्तित चेतना-अवस्था में गिरे बिना, सामान्य जाग्रत चेतना-अवस्था में रहते हुए ही, वह अवस्था दिव्यता के स्पंदन को प्रकट करने वाली बने, इस ओर तुम्हें ले जा रहे हैं।

★दिव्य चेतना-अवस्था क्या है
दिव्य चेतना का अर्थ है, सामान्य रूप से जाग्रत चेतना-अवस्था का सार्वभौमिक प्रेम के सिद्धांत पर आधारित करुणामय चेतना-अवस्था में होना।
वह कभी भी परिवर्तित चेतना-अवस्था या अतींद्रिय शक्ति या आत्मिक शक्ति के प्रकट होने की अवस्था नहीं है, बल्कि वह अवस्था है जिसमें साधारण चेतना ज्यों-की-त्यों जीवन की अपनी दिव्यता को प्रकट करती है।
परिवर्तित चेतना-अवस्था तो सही मार्गदर्शक के बिना गलत साधना करके भी अनुभव की जा सकती है, और नशीले पदार्थों से भी अनुभव में आ सकती है।
यहाँ मैं साफ़-साफ़ बताना चाहता हूँ कि हम जिस दिव्य चेतना नाम की मनःस्थिति की सलाह देते हैं, उसका मनोचिकित्सा और आध्यात्मिक जगत के क्षेत्रों में चर्चित परिवर्तित चेतना-अवस्था (ASC) से कोई संबंध नहीं है।
हमारे बताए मार्ग से देखें, तो वह एक घुमावदार रास्ता बन जाता है।
जैसा अभी कहा, साधारण चेतना का सहज रूप से बिना किसी मोह और बिना किसी आग्रह के, किसी भी बात, किसी भी चीज़ में बँधे बिना, ज़रा-सी भी चिंता या भय उठे बिना, अडिग हृदय से दिव्यता को प्रकट करने वाली चेतना-अवस्था में होना ही असेंशन हुई चेतना-अवस्था है, दिव्य बन चुके मनुष्य का रूप है।
इसके लिए, दूसरों से बढ़कर कोई चीज़ चाहने के बजाय, हर किसी के हृदय की गहराई में बसी दिव्यता को विकसित करके उसे विचार, वचन और कर्म में प्रकट करना अच्छा है।
वह किसी दूसरे से अपनी मान्यता माँगने का मार्ग नहीं है, बल्कि अपने भीतर की दिव्यता को याद करके, किसी और से पहले स्वयं अपनी पूर्णता को स्वीकार करने का मार्ग है।
इसका सबसे अच्छा तरीका, जैसा मैं हमेशा कहता हूँ, हर समय की साँस को धीमी लय में दोहराते रहना है।
ऐसा करो तो, साधारण विचार, वचन और कर्म, स्वाभाविक रूप से दिव्य क्षेत्र के विचार, वचन और कर्म में ऊपर उठते जाते हैं।
यह बात मन में अंकित करके मत भूलना, और धैर्य से, बिना हार माने, साँस को धीमा और आरामदायक करके देखो।
तब तुम, किसी और के नहीं बल्कि अपने ही जीवन के सत्य को अपने हाथ में पकड़ लोगे, और ज्यों-के-त्यों तुम, पता ही नहीं चलेगा कब, ब्रह्मांड जितने विस्तृत होकर, एक ही जगह बैठे-बैठे सब कुछ जान लेने वाले दिव्य-मानव (शिनजिन) में बदल जाओगे। (समाप्त)






