एक सत्य का अभ्यास दस हज़ार सिद्धांत जानने से बढ़कर है (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
संरक्षक आत्माओं और संरक्षक देवताओं के बारे में
पृथ्वी की समस्त मानवता के जीवन के माता-पिता महान ईश्वर को उन लोगों पर दया आई जो सतही चेतना में ऐसा नहीं चाहते फिर भी ऐसी स्थिति में पड़ते हैं, और जब से मानवता दूसरे तारों से पृथ्वी पर आत्मिक रूप से पुनर्जन्म लेकर, उस आत्म-देह के स्पंदन को स्थूल करके सूक्ष्म देह बनाकर, अंत में शरीर बनाकर उस शरीर में प्रवेश कर गई, तब से, ताकि अंतिम-अंतिम मोड़ पर सब चेतना का विकास कर सकें, हर एक के जीवन-ढाँचे के भीतर, आंतरिक दिव्यता के बाहरी उद्धार-हृदय के रूप में, आरंभ से ही संरक्षक देवता को नियुक्त किया, और बाद में पहले उस लोक में लौट चुके पूर्वजों में से संरक्षक आत्मा को नियुक्त करके वंशजों के सही मार्गदर्शन का कार्य सौंपा।
आजकल के लोग जिन्हें हायर सेल्फ़ कहते हैं, उनमें जब सच्ची बात कही जा रही हो, तब हायर सेल्फ़ का अर्थ सब इन्हीं संरक्षक आत्माओं और संरक्षक देवताओं से है।
संरक्षक आत्मा या संरक्षक देवता ऐसी चीज़ नहीं जो किसी को पैसे देकर लगवाई जाए।
ऐसा नहीं है।
लेकिन जब मनःस्थिति इतनी कठिन हो कि तिनके का सहारा भी लेना चाहो, तब ऐसी बातों पर विश्वास कर लेना और अनजाने में सूक्ष्म लोक के अनसुलझे विचार-समूहों को मन और शरीर का अधिकार सौंप देना भी हो जाता है, इसलिए कृपया सावधान रहना।
इसीलिए मैं बार-बार ज़ोर देकर कहता हूँ, “हर किसी को दिव्यता याद करके उसका बोध करना है।”

एक सत्य का अभ्यास दस हज़ार सिद्धांत जानने से बढ़कर है
यह बात केवल ज्ञान के रूप में जानना बिल्कुल पर्याप्त नहीं।
इसे शरीर और मन से, पूरे तन-मन-आत्मा से समझना होगा।
इसका पहला कदम है सच्चे सत्य से मिलना, और उस पर विश्वास करके उसका अभ्यास करना।
सच पर विश्वास करना और उसका अभ्यास करना ही एकमात्र सच्चा मार्ग है।
इसका अर्थ है कि सार्वभौमिक सत्य का कर्म ही अपनी चेतना के विकास को खींचने वाली प्रेरक शक्ति है।
कितना भी ज्ञान पा लो, अगर वह अपने भीतर न उतरा हो, तो उसका कोई मूल्य नहीं न?
केवल सिर के ज्ञान पर अड़े बिना, जीवन के सत्य को कर्म में प्रकट करना है।
2018 का वर्ष, डगमगाती विश्व-स्थिति, विभिन्न स्थानों की प्राकृतिक आपदाओं, AI के उदय और जीवन-नैतिकता से जुड़ी चिकित्सा की चुनौतियों के कारण भी, “मनुष्य के मनुष्य होने का अर्थ” फिर से देखने का वर्ष होगा।
लेकिन तुम, जो जीवन के प्रकाश को खोए बिना चेतना के विकास के मार्ग पर स्थिर रूप से चलते जा रहे हो, पिछले वर्ष से भी अधिक, वस्तु और मन दोनों की समृद्धि और स्वास्थ्य से भरपूर होकर, अपनी मनःस्थिति को और गहरा करते जाओगे।
हँ? क्यों?
हाँ, क्योंकि तुम उस सही मार्ग पर, जीवन के महामार्ग पर चल रहे हो जहाँ ऐसा होना ही है। (समाप्त)






