सत्य और मानवता के संबंध के बारे में
प्रकाशित अद्यतन
★ऐसा युग जिसमें सत्य की झलक कहीं भी पाई जा सकती है
अब तो कहीं भी, कुछ भी करते हुए, अचानक चेतना को दिव्य क्षेत्र के केंद्र में एकाग्र करो तो तरह-तरह की समझ कौंधने लगती है, है न।
यह इसलिए है कि सत्य का प्रकाश भौतिक जगत के आकाश में भी भरपूर भरा हुआ है, और तुम लोग ब्रह्मांड के सत्य में लिपटे हुए जी रहे हो; पर यह इसलिए हुआ कि तुम लोगों ने वर्षों तक पृथ्वी की शांति और मानवता के जागरण की प्रार्थना की, जिससे तुम लोगों के रहने के क्षेत्र का आयाम असीम रूप से चौथे आयाम के स्पंदन-लोक के निकट आता गया है, और ख़ास तौर पर घर चौथे आयाम या उससे ऊपर का पवित्र क्षेत्र बन चुका है; इसलिए अब पहले की तरह जान-बूझकर पवित्र स्थल तक जाए बिना भी, अपने जीवन के मूल स्रोत से मिलने वाला मार्गदर्शन तुम जहाँ हो वहीं स्वच्छंद रूप से पा सकते हो और उसे तुरंत काम में ला सकते हो।
और चेतना तो पहले ही पाँचवें आयाम के स्पंदन-लोक से सीधे जुड़ी हुई है, तो यह तो सोने पर सुहागा है, है न।
हाँ, ठीक है, तुमने अभी सोचा, “कैसा सुविधाजनक युग आ गया,” पर यह बात केवल और केवल तुम लोगों की रोज़ की साधना का फल है, इसके सिवा कुछ भी नहीं।
★सत्य ऐसी स्थिति में है कि उसे कोई भी पा सकता है
तो इस आकाश में भरपूर भरा सत्य का प्रकाश, जब पृथ्वी का आत्मिकीकरण पहले से आगे बढ़ चुका है, आज के युग में मानवता के हर व्यक्ति के लिए द्वार खोले हुए है; पर देखो कि इस प्रकाश की गूँज को सचमुच पाकर अपने जीवन में काम में लाने वाले लोगों की संख्या कितनी है, तो यह बेहद कम है।
मोबाइल फ़ोन पर किसी से बात करने की कल्पना करो, तो यह बात शायद समझना आसान हो।
मोबाइल फ़ोन साथ रखकर, चालू करके इस्तेमाल कर रहे हो, तो सिग्नल की पहुँच के भीतर कोई भी, कहीं भी, परिवार और मित्रों से वहीं से बात कर सकता है, है न।
लेकिन अगर मोबाइल फ़ोन है ही नहीं, या है भी तो बंद रखा है, या साइलेंट मोड पर डालकर देखते भी नहीं, तो फ़ोन बजे भी तो पता नहीं चलता, है न।
बिल्कुल वैसा ही है।
टीवी हो या रेडियो, बात एक ही है; जहाँ बहुत लोग रहते हैं, वहाँ तरंगें हर जगह को घेरकर आकाश में बह रही हैं।
पर अगर उन तरंगों को पकड़ने वाला यंत्र (क्षमता) न हो, तो कोई भी उन तरंगों को पकड़कर देख, सुन या बोल नहीं सकता, है न।
अब ऐसा युग आ गया है जिसमें सत्य का प्रकाश सबको समान रूप से मिल सकता है, फिर भी बहुत से लोग उसे ग्रहण करने की क्षमता को सुलाए हुए हैं।
अभी की उपमा से कहें, तो मोबाइल फ़ोन होते हुए भी उसे बंद रखा है, या चालू होते हुए भी साइलेंट पर डालकर देखते भी नहीं, इसलिए सत्य की पुकार का जवाब नहीं दे पा रहे, और उसे इस्तेमाल करने की इच्छा ही नहीं है, इसलिए खुद बोलकर सत्य के प्रकाश से बातचीत नहीं कर पा रहे, यही बात है।

★सत्य की पुकार बजती जा रही है ~ उस दिन तक जब पूरी मानवता की दिव्यता पुनर्जीवित हो
अभी पूरी पृथ्वी करो-या-मरो के महत्वपूर्ण मोड़ पर है, इसलिए सबके लिए सत्य की पुकार लगातार बज रही है।
हाँ, दूसरी उपमा से कहें, तो जितना भी बंद करो, फिर भी बजना बंद न होने वाली अलार्म घड़ी जैसी कुछ है।
“चलिए, सब लोग, अब उठने का समय हो गया है,” कहते हुए सत्य का प्रकाश स्वयं, बहुत ही कृपापूर्वक, जान-बूझकर चेतना के विकास की प्रेरणा दे रहा है।
यह सत्य का प्रकाश, कुछ लोग आगे चलकर जानेंगे, तुम्हारे अपने जीवन के प्रकाश के बिल्कुल समान प्रकाश है।
मनुष्य का सार धड़ से सिर और हाथ-पैर जुड़े रूप वाली कोई चीज़ नहीं है; वह निराकार ब्रह्मांड में व्याप्त, अनंत विस्तार वाला प्रकाश भी है, और सूक्ष्मता से बारीकी में देखो तो सब वस्तुओं को अस्तित्व देने वाला, ब्रह्मांड का सबसे छोटा कण, जीवन-परमाणु स्वयं भी है।
यह बात, सतही चेतना के तुम्हारे अपने सच्चे हृदय-स्वरूप में एकाग्र होते जाने की प्रक्रिया में स्पष्ट रूप से अनुभव होती जाती है, पर……सरल शब्दों में कहें, तो किसी और का नहीं, किसी और चीज़ का नहीं, तुम्हारा अपना सार ही सत्य का प्रकाश था।
अब ऐसी सही घड़ी है जिसमें किसी भी वैचारिक पृष्ठभूमि से परे, सब याद करें कि हम एक जीवन वाला ब्रह्मांड स्वयं थे, और उसे अपने मन-शरीर में प्रकट करते जाएँ।
यह कई समझ के चरणों से गुज़रकर पहुँची जाने वाली अवस्था है, पर एक दिन हर कोई अपने को लेकर, “हम ब्रह्मांड स्वयं के ही अंश-मन, अंश-प्रकाश थे,” यह जान लेने का क्षण आएगा।
तुम लोग उसके अग्रदूतों में से एक के रूप में, सत्य के मनुष्य “सच्चे मनुष्य” का जीवन-ढंग दुनिया को दिखाओ, और आगे सत्य को याद करके चलकर आने वाले लोगों के गुज़रने का “जीवन का महामार्ग” तैयार करते रहो।
क्योंकि ऐसा करने से पृथ्वी-जगत का सामंजस्य और आगे बढ़ेगा, और यह आने वाले ब्रह्मांडीय युग का द्वार खोलना भी होगा।






