पृथ्वी का भविष्य खोलने वाला “भावों को चखकर पहचानना”
प्रकाशित अद्यतन
★उठे हुए भाव को चखकर पहचानो
चेतना-विकास या असेंशन कही जाने वाली, आत्मा-प्राण के दिव्यीकरण को बिना रुकावट पूरा करने के लिए, जैसे भोजन का स्वाद अच्छी तरह चबाकर लिया जाता है, वैसे हर क्षण अपने उठे हुए भाव की हलचल को ज़रा भी छोड़े बिना पकड़कर, चखकर पहचानना अच्छा है।
और उस समय किस कसौटी से, चेतना का उपयोग कैसे करें? यह पहचानते हुए चखने वाली चेतना का उपयोग करो कि वह भाव अपने सच्चे हृदय, मूल रूप की चेतना (जीवन-प्रकाश में जड़ जमाया भाव) है, या वैसा नहीं (शरीर से चिपके व्यक्तिगत स्व से उठा भाव)।
बेशक उस समय साँस गहरी रखना बुनियाद की बुनियाद है।
इस तरह जीने पर चेतना-विकास की गति कहीं तेज़ हो जाती है और गहरे स्वयं में रहने का समय बढ़ता जाता है।
★गहरे स्वयं को लगातार प्रकट करना = क्राइस्ट का पुनरागमन
तो गहरे स्वयं में रहना क्या है? यह स्वयं «जीवन के प्रकाश» की चेतना (ब्रह्मांडीय सृजन-ऊर्जा से सीधे जुड़ी जीवन-प्रकाश चेतना) में रहना है, इसलिए उस गहरी चेतना को सतही चेतना में प्रकट करके जीना, अब तक की तरह कर्म-बंधन (कर्म-स्पंदन) पैदा किए बिना महाजीवन की ब्रह्मांडीय सृजन-गतिविधि में सक्रिय रूप से भाग लेना और अपनी स्थिति (पृथ्वी) में मिला मिशन पूरा करना है।
यही सीधे «क्राइस्ट के पुनरागमन का कार्य» बनकर पृथ्वी-जगत में पूर्ण सामंजस्य की शांत दुनिया फैलाने में सहायक होता है।
क्राइस्ट का पुनरागमन सुनकर पृथ्वी के बहुत-से लोग समझते हैं कि लगभग 2000 साल पहले धरती पर शरीर के साथ जिए नासरत के ईसा, जिन्हें ईसा मसीह कहा जाता है, आज की दुनिया में फिर जन्म लेंगे। लेकिन “क्राइस्ट का पुनरागमन” शब्द का असली अर्थ यह है कि पृथ्वी की मानवता का हर व्यक्ति अपने जीवन के सार को धरती की सतही चेतना में फिर से याद करे और स्वयं जीवन-प्रकाश चेतना को शरीर में प्रकट करके जी सके।
“क्राइस्ट” शब्द, हमारे अर्थ में, «सत्य» है।
क्राइस्ट का प्रतीक क्रॉस सत्य के मनुष्य में प्रकट होने का प्रतीक है।
अरे? प्रतीक क्यों?
क्योंकि खड़ी रेखा मन का प्रतीक है, पड़ी रेखा धरती के भौतिक जगत (अपने शरीर समेत) का प्रतीक है, और यह दिखाती है कि स्वयं «जीवन के प्रकाश» के रूप में खड़ा मानसिक स्पंदन, पड़ी लहर भौतिक स्पंदन के साथ आड़े-तिरछे क्रॉस में सामंजस्य की अवस्था में आ गया। यह तीसरे आयाम के रूप में प्रकट क्रॉस-आकार का असली अर्थ है।
इसलिए नासरत के ईसा का क्रॉस पर चढ़ाया जाना, सिर्फ़ यह नहीं था कि ईसा से डरे उस समय के लोगों ने एक फाँसी की विधि के रूप में सूली दी, बल्कि इसका एक पहलू यह भी था कि पृथ्वी की रक्षा करने वाले देवताओं और ब्रह्मांडीय देवदूतों के समूह ने ईसा के साथ, पृथ्वी-जगत की पूर्णता के समय, यानी वर्तमान तक को देखते हुए सलाह के परिणाम में, सूली नाम की स्वर्गारोहण-विधि चुनी थी।
क्योंकि क्रॉस के आकार में दिखाया गया खड़ी और पड़ी रेखाओं का मिलन, मन और पदार्थ का सामंजस्य, आने वाली पृथ्वी पर यह तय करने वाला महत्वपूर्ण तत्व है कि ब्रह्मांड के अन्य तारों पर इस्तेमाल होने वाली वैज्ञानिक शक्ति पृथ्वी-जगत में उतारी जाएगी या नहीं।
यह बात ईसाई धर्म से दूर-दूर तक संबंध न रखने वाले भी सब दिमाग़ में रख लें तो अच्छा है।
क्योंकि एक दिन “ओह, यह बात थी” कहकर समझ आने का समय आएगा।
★दिव्यता की बुद्धि, अनंत प्रज्ञा के उपयोग का रहस्य
तो बात शुरुआत पर लौटाएँ, मैंने कहा था कि जब अपने उठे भाव को स्वयं «जीवन के प्रकाश» का भाव या शरीर से चिपका भाव, चखकर पहचानना, भेद करना आ जाता है, तो आत्मा-प्राण का दिव्यीकरण तेज़ होता है।
यह बात अपने-आप में तब हो सकती है जब सतही चेतना का वृत्त (स्पंदन-लोक) थोड़ा भी दिव्यता के वृत्त में प्रवेश कर चुका हो, इसलिए चेतना-विकास की ओर बढ़ने वाला कोई भी कर सकता है।
और इस तरह सचेत रूप से जीना वह रहस्य है जिससे जिन सारे भावों को अपना मैं समझते हो, वे ब्रह्मांड के महाजीवन के प्रकाश से पल-पल धुलते हैं, सिर्फ़ वे भाव दिमाग़ में लौटाए जाते हैं जिन्हें याद रखने में हानि नहीं, और उसके साथ, अब तक प्रकट न कर सकी दिव्यता की बुद्धि, अनंत प्रज्ञा सतह पर आती है और शरीर के सामान्य भाव के रूप में इस्तेमाल हो सकती है।
इससे मिलती-जुलती बात अब तक कई बार कर चुका हूँ, लेकिन यह बहुत महत्वपूर्ण है। यह हो जाने पर अतीत की तुलना में जीना इतना आसान हो जाता है कि कहा नहीं जा सकता।
क्यों? क्योंकि अपने भाव अतीत की तरह पीड़ा पैदा नहीं करते और अनंत खुशी की शृंखला वाले स्पंदन-लोक में जीना संभव हो जाता है।
★सत्य न जानने के युग का जीवन-ढंग
सत्य न जानने वाली अब तक की मानवता का जीवन-ढंग पीड़ा के भँवर से न निकलकर चींटी-गड्ढे पर चढ़-गिर क्यों रहा था? क्योंकि वह ऐसी द्वैत-विरोध धारणाओं की दुनिया से चिपकी थी जहाँ खुशी के पीछे दुख है, धन-संपन्नता के विपरीत दरिद्रता ताक में है, स्वास्थ्य और अस्वास्थ्य पीठ-से-पीठ जुड़े हैं।
ऐसा क्यों था? क्योंकि पृथ्वी की मानवता का ज़्यादातर हिस्सा मनुष्य के मूल दायित्व (किसी भी तारे की मानवता के लिए साझा मिशन), «महाब्रह्मांड को अस्तित्व देने वाले ब्रह्मांड के महाजीवन की सृजन-गतिविधि में हिस्सा बँटाना», यानी जीने के परम उद्देश्य को खो चुका था।
यह भी बस अच्छे-बुरे के पैमाने से नापने की बात नहीं, बल्कि हर तारे की दुनिया में विकास की प्रक्रिया का एक-एक दृश्य भर था।

★भावों को चखकर पहचानने के आगे की दुनिया
शुरू में कही बात, पल-पल के भावों की हलचल को छोड़े बिना चखकर पहचानते जाओ, तो ब्रह्मांड की ऐसी योजना और पृथ्वी पर पुनर्जन्म से पहले की आत्मा की स्मृतियाँ भी जाग उठती हैं।
जल्द ही वह समय आएगा जब किसी के लिए भी पृथ्वी पर आने से पहले जिस तारे पर रहते थे वहाँ जाना, टोक्यो से नागोया या ओसाका जाने से भी पास लगेगा।
यह ऐसा नहीं कि ऐसा अनुभव करने के बाद वैसा लगे, बल्कि जिन्हें ऐसा लगने लगे (याद आ जाए), उनसे पहले अन्य तारों की दुनिया से मेल-जोल शुरू होगा।
वह पहले शरीर से नहीं, आत्म-देह से जाना होगा।
क्योंकि पृथ्वी से जुड़े अन्य तारों की दुनियाएँ पहले ही सब आत्मिक धरती-आकाश बन चुकी हैं।
बहुत-से लोगों का शरीर के साथ दूसरे तारे पर जाना अभी बहुत आगे की बात है।
क्योंकि जब तक पृथ्वी-जगत का कोना-कोना भौतिक स्पंदन और मानसिक स्पंदन दोनों में आत्मिक अवस्था में नहीं जाता, वहाँ रहने वाले लोगों (पृथ्वीवासियों) का असेंशन पूरा नहीं होता।
★तुम पृथ्वी को पूर्ण करने के लिए जन्मे हो
लेकिन इसे पूरा करने के लिए इस बार तुमने अपना शरीर चुनकर पृथ्वी पर पुनर्जन्म लिया है।
पृथ्वी-जगत में महान सामंजस्य की दुनिया पूर्ण करने के लिए, और पृथ्वी पर अनेक पुनर्जन्मों के निचोड़ के रूप में।
इसी से जुड़ी बात, पृथ्वीवासियों की आयु अब से बढ़ाने वाले अभी धरती पर जी रहे तुम लोग हो।
यह नाटकीय रूप से बढ़ेगी।
अभी 110 या 120 साल पर चौंकना बिल्कुल सामान्य हो जाएगा, और 150, 200 साल तक जीने वाले लोगों का प्रकट होना अगले 100-150 साल में वास्तविकता बनेगा।
★ब्रह्मांडीय मानवता से मेल-जोल द्वारा सामाजिक व्यवस्था का बदलाव
सामाजिक व्यवस्था का बदलाव भी, जब तारों से पृथ्वी पर आ रही उड़न तश्तरियों से मेल-जोल सार्वजनिक होगा, स्वाभाविक रूप से होगा।
ऐसी दुनिया बनेगी जहाँ पैसे, अब तक के पद और मूल्यों का कोई मूल्य या अर्थ नहीं रहेगा।
शुरू में यह धरती-आकाश हिला देने वाली घटना लग सकती है।
जब पृथ्वी के विविध नेतृत्व-वर्ग और वैज्ञानिक हमारी दिव्य-आत्मा वैज्ञानिक शक्ति को अपनी आँखों से देखकर, गरमागरम बहस के बाद, नए विज्ञान के स्वरूप को स्वीकार करने का मन बना लेंगे, वही पुरानी सभ्यता का अंत होगा और साथ ही नए ब्रह्मांडीय युग का आरंभ।
और जब समझ आएगा कि हमारी यह वैज्ञानिक शक्ति अन्य अनेक तारों पर अपनाई गई ब्रह्मांडीय समाज की मानक व्यवस्था है और उसी के आधार पर चलाई जाती है, तब पृथ्वी के वैज्ञानिक और नए युग के वैज्ञानिक-उम्मीदवार केंद्र में रहकर, जैसे रुई पानी सोखती है, वैसे पृथ्वी-विज्ञान और ब्रह्मांड-विज्ञान का संगम करते जाएँगे।
इसकी बुनियाद है तुम्हारा रोज़ बिना रुके किया जाने वाला भावों को चखकर पहचानना।
यही पृथ्वी का भविष्य खोल रहा है।
यह कैसे जुड़ता है, अभी समझने वाले और न समझने वाले दोनों, इस बोध के साथ कि हम सब मिलकर पृथ्वी का भविष्य खोल रहे हैं, हर दिन आत्म-विश्वास से जीओ।
तुम्हारा लगन भरा रोज़ का प्रयास असल में पृथ्वी-जगत के आत्मिकीकरण-दिव्यीकरण (असेंशन) को बढ़ावा देने वाली प्रेरक शक्ति था, यह दुनिया की मानवता को व्यापक रूप से ज्ञात होगा, और सँभाल न सकने जितनी कृतज्ञता के प्रकाश से तुम्हें और गहरी अवस्था में ऊपर उठा दिया जाएगा, वह दिन ज़रूर आएगा।







