मन-शरीर को दिव्य क्षेत्र के स्पंदन का अभ्यस्त बनाने के लिए (उत्तरार्ध)
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(पिछली बार से जारी)
★सतह पर आए अँधेरे को बाहर नहीं, मन के भीतर देखकर ऊपर उठाओ
तो, ब्रह्मांड-जगत के सारे आकाश और धरती, सबसे सूक्ष्म मन और पदार्थ से लेकर सबसे विशाल मन और पदार्थ तक, सब स्पंदन से बने हैं, और उनकी रचना ऐसी की गई है कि वे बार-बार नवीनीकरण करते हुए, विकास और सृजन करते हुए, सामंजस्य और आत्मीयता को ऊँचा करते और चरम तक ले जाते रहें।
बहुत-बहुत लंबी दृष्टि से न देख सको तो शायद यह बात समझ में न आए, लेकिन यह एक निर्विवाद तथ्य है, और पुराने ढर्रे वाले आज तक के मूल्य आगे चलकर टिक नहीं पाएँगे और पूरी तरह मिट जाएँगे, और उनकी जगह बिल्कुल नए मूल्यों वाला, सूक्ष्म बन चुका दिव्य-आत्मा सभ्यता का संसार, पृथ्वी-लोक में भी वास्तविक रूप से खुलने का समय आएगा।
अभी वह अंतिम चरण चल रहा है।
“आज का संसार खारे-मीठे पानी के संगम जैसा है”, यह बात मैंने पहले तुम्हारी प्रेरणा में उँडेली थी न।
उसका अर्थ है कि संसार पुरानी और नई सभ्यता के तौर-तरीकों के बुरी तरह आपस में घुले-मिले होने की स्थिति में है, और उस दृष्टि से देखें तो आज के युग में सत्य और असत्य खरे-खोटे की तरह मिले हुए हैं, और क्या सत्य है, क्या असत्य, क्या सामंजस्य की ओर उन्मुख भविष्य वाला ढंग है और क्या व्यक्तियों या संगठनों के स्थापित हितों की रक्षा करने वाला रूढ़िवादी ढंग, यह सब, अगर चेतना के पैर दिव्य क्षेत्र में न टिके हों, तो ऊपरी तौर पर पहचानना बहुत कठिन हो गया है।
ऐसे में, एक बात साफ़ कही जा सकती है, इस बड़े बदलाव वाले संसार में, अब तक छिपाए जा सकने वाले गलत काम और असत्य की स्थितियाँ उजागर होकर दुनिया की नज़रों के सामने आने की घटनाएँ हाल में बढ़ी हैं, लेकिन ऐसा होने से, उन चेतना-स्तरों वाले लोगों तक भी, जहाँ अब तक जीवन का प्रकाश नहीं पहुँचता था, आख़िरकार जीवन का प्रकाश पहुँचने लगा है।
वे अब तक प्रकाश न पहुँचने वाले घने अँधेरे में छिपकर, चुपचाप अपनी जेबें भरते थे, सत्ता और नाम की लालसा का मनमाना आनंद लेते थे, या कमज़ोर मन वाले लोगों को तरह-तरह से सताते थे, लेकिन ऐसे लोगों तक भी जीवन का प्रकाश पहुँचने लगा है, इसलिए अब तक छिपकर पूरे सामंजस्य की टाँग खींचने वाले लोगों और अविकसित संगठनों की असलियत आख़िरकार धूप में आ गई है, और सबकी नज़रों के सामने होने लगी है।
जो बातें अभी सामने नहीं आईं, वे भी आगे चलकर उजाले में आएँगी, और हर व्यक्ति अपने-आप मन बदलता जाए, ऐसी धारा बनती जाएगी, इसलिए इसकी चिंता करने की भी ज़रूरत नहीं है।

★ऐसे संसार में जीने के लिए जहाँ नकारात्मक शब्द मृत शब्द बन चुके हों
तो, तुम लोग जब ऐसे समाचार देखो-सुनो, तब उन कामों को उलटी सीख मानकर, ऐसे लोगों की आलोचना करने वाले विचारों की दिशा अपनी ओर मोड़ दो, और अपने मन के कोने-कोने तक दिव्यता के प्रकाश से रोशन करके, अपने भीतर ज़रा-सा भी असत्य न बचे, इतना अपने मन को चमचमाता निखारना महत्वपूर्ण है।
दिव्यता सतह पर आ चुकी चेतना, दूसरों के बारे में बुरा नहीं सोचती, बुरा नहीं कहती, रूखा व्यवहार नहीं करती, और नीची नज़र से भी नहीं देखती।
जब दूसरों की आलोचना करने का मन उमड़े, तो जाँच लो कि कहीं तुम ठीक उलटी भावना में तो नहीं घुस गए, कहीं तुमने भी कभी वैसी ही योजना तो नहीं बनाई थी, और क्या अभी तुम भी वही तो नहीं कर रहे, वही तो नहीं सोच रहे, आदि।
सामने वाले से गलती मनवाकर सुधार या क्षमा माँगना, शिक्षा देने वाले मार्गदर्शन की ज़रूरत वाले मामलों को छोड़कर, सच में जितना हो सके न करना ही बेहतर है, और अगर उस व्यक्ति से सीधा कोई संबंध न हो, तो उसे उसके विकास की प्रक्रिया मानकर “बुरा न देखो, बुरा न सुनो, बुरा न कहो” पर पूरी तरह टिके रहो।
और, शांति से सोचने पर भी अगर लगे कि सामने वाले को कुछ बताना ही बेहतर है, तो सामने वाले के सार में दिव्यता को स्वीकार करते हुए, भावुक हुए बिना (दिल की धड़कन तेज़ किए बिना), सहजता से, लेकिन जीवन का प्रकाश साफ़-साफ़ बिखेरते हुए, केवल तथ्यों को स्पष्ट रूप से बताना अच्छा है।
और सामने वाला कैसी प्रतिक्रिया करता है, यह उसकी स्वतंत्रता पर छोड़ दो।
उसका हायर सेल्फ़ बात को अच्छे ढंग से आगे ले जाएगा।
आज की बात दिव्यता पर आधारित चेतना के उपयोग का एक उदाहरण है, और पहली बात पर लौटें तो, दिव्यता सतह पर आने लगे, तो किसी को मार डालने जैसा विचार उमड़ता ही नहीं, और “मार डालूँ क्या” मज़ाक में भी नहीं कहा जाता।
उस हद तक न भी पहुँचो, तब भी दूसरों की टाँग खींचने या उन्हें नीचा दिखाने जैसी बात सूझती ही नहीं।
ऐसे असत्य वाले काम, पृथ्वी का आत्मिकीकरण थोड़ा और आगे बढ़ने पर, केवल दूर अतीत के व्यवहार के रूप में दर्ज रहेंगे, और आज के (भविष्य के) संसार में ऐसा व्यवहार करने की कोशिश करने वाला कोई नहीं रहेगा।
अगर तुम इस तरह सबके दिव्यता प्रकट करने वाले संसार में बदलाव देखना चाहते हो, तो अभी से दिव्यता के विचार, दिव्यता के शब्द, दिव्यता के कर्म सक्रिय रूप से प्रकट करो, और अभी से मन-शरीर को दिव्य क्षेत्र के स्पंदन का अभ्यस्त बना लो।
ऐसा कर लो, तो नई सभ्यता के युग में प्रवेश करते समय, शुरू से ही दिव्य मानवता के कुशल जानकार के रूप में, लोगों के लिए आदर्श बनने वाले जीने के ढंग को प्रकट करने वाले व्यक्ति बन सकते हो। (समाप्त)






