आत्म-चेतना का मार्गदर्शन करने के लिए (पूर्वार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
★अपने कद के अनुरूप चेतना के विकास की साधना को स्थिर रूप से करते जाएँ
जैसे ऐसी स्वास्थ्य-विधि जिससे शरीर खुश न हो, फल नहीं देती, वैसे ही ऐसा चेतना के विकास का अभ्यास जिससे मन खुश न हो, वह भी आसानी से परिणाम नहीं देता, और उसी चेतना-स्तर की अवस्था में चक्कर काटता रह जाता है।
यह कैसी बात हो जाती है, तो यह ऐसा है जैसे बेस्वाद डाइट-भोजन को ज़बरदस्ती गले से उतारकर, किसी भी तरह वज़न घटाने की कोशिश करना; यानी असल में करना नहीं चाहते फिर भी ज़बरदस्ती चेतना का विकास करने की कोशिश करना, या पंजों पर उचककर अपने कद से न मिलने वाली चेतना के विकास की साधना को खुद पर थोपना।
ऐसा क्यों हो जाता है, क्योंकि चेतना के विकास में मूल रूप से महत्वपूर्ण बात को अपने भीतर उतारे बिना ही, आगे का रास्ता जल्दी-जल्दी तय करने की कोशिश की जाती है।
यह उस स्थिति जैसा है जब पूर्व-तैयारी हुए बिना ही अभिनेता मंच पर चढ़कर अभिनय करने लगें।

अच्छा मंच वह है जो रिहर्सल दोहराकर, कब कौन क्या संवाद बोलेगा, कब कौन कहाँ कैसे चलेगा, मंच-सज्जा कैसी होगी, प्रकाश ऐसा होगा, ऐसी तरह-तरह की सहमतियाँ जमाकर बनाया गया हो, इसीलिए वह लोगों को भावविभोर कर सकता है या हँसा सकता है, है न?
और अंततः सभी संबंधित लोग एक साँस की तरह प्रदर्शन कर पाने लगते हैं, उदाहरण के लिए, केवल आँखों में देखकर समझ जाते हैं कि सामने वाला क्या करने वाला है और मुझसे क्या चाहता है, ऐसे लोग बन जाते हैं।
ऐसे लोगों के अभिनय वाला मंच देखने लायक होता है।
अगर ऐसी तैयारी के बिना अभिनेता मंच पर चढ़ जाएँ, तो कैसा प्रदर्शन होगा, हूँ…… वह बिखरा-बिखरा होगा, यह आग देखने से भी स्पष्ट है न?
जब चेतना के विकास के अभ्यास में भी ऐसा ही किया जाता है, तब मन झंझट की ओर झुक जाता है, या शक्ति बने बिना ही शक्तिशाली लोगों के काम की नकल करने की कोशिश में, क्षमता की कमी से असफल हो जाता है। (अगली बार जारी)






