आत्म-चेतना का मार्गदर्शन करने के लिए (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
★ईमानदार अभ्यास ही मार्ग खोलता है
इस तरह किए जाने वाले हर अभ्यास का अपना-अपना उचित कारण है।
हम केवल सच ही बोलते हैं, इसलिए कृपया अभ्यास करके देखो, और उसके प्रभाव को अपने शरीर से अनुभव करो।
कहते हैं न, तर्क से बढ़कर प्रमाण।
सिर के भीतर सार्वभौमिक सत्य को केवल उलट-पलटकर मज़ा लेते रहने से तुम्हारा कोई विकास नहीं होता, और गहरी समझ न भी हो, अगर सिखाई गई बात का सही ढंग से अभ्यास करते रहो, तो प्रभाव अवश्य तुम्हारे मन और शरीर में प्रकट होगा, और एक दिन पीछे मुड़कर देखते समय “अरे, इतना चेतना का विकास हो गया था, वाह, कमाल है,” ऐसा कहकर, अपनी ही बात पर, प्रभावित होने का समय आएगा।
गहरी साँस का अभ्यास, जागते रहने तक जितना अधिक हो सके करते रहो, तो हर कोई अपने जीवन के मूल स्रोत के प्रकाश से संवाद करके, न जाने कब, अनजाने में, दिव्य चेतना का अनुभव कर लेता है।

अवश्य।
झूठ नहीं है।
बस बात यह है कि करते हो या नहीं……
केवल अभ्यास करना ही अपना मार्ग खोलकर स्थिर चेतना के विकास का अनुभव कराता है।
ऐसे सच्चे सार्वभौमिक सत्य का अभ्यास करके देखो जिससे आत्मा काँपकर आनंदित हो।
साँस को गहरा करने में न पैसा लगता है, न किसी का समय उधार लेकर सीखते हुए करना पड़ता है।
बस तुममें इच्छा हो, तो बिस्तर पर पड़ा व्यक्ति भी, व्यस्तता में भागदौड़ करने वाला व्यक्ति भी, और भरपूर समय वाला व्यक्ति तो है ही, कोई भी यह कर सकता है।
सच्चा सार्वभौमिक सत्य महँगी फ़ीस चुकाकर हाथ में आने वाली चीज़ नहीं है।
न ही यह किसी से लिपटकर, पीठ धकेलवाकर, हाथ पकड़वाकर ले जाई जाने वाली चीज़ है।
यह अपने भीतर निहित जीवन के प्रकाश के साथ एक होकर सच्चे अपने आप में लौटना है।
दूसरे शब्दों में, ऑक्सीकृत विचार-आदतों को ताज़ा जीवन-प्रकाश में लौटाकर, इस दुनिया में जन्म लेने के सच्चे मिशन को पूरा करते जाना है। (समाप्त)






