बुज़ुर्गों के आयामी उत्थान की ओर (6)
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(पिछली बार से जारी)
★तुम लोग पृथ्वी के विकास के अग्रणी हो
बात काफ़ी भटक गई, लेकिन आगे के संसार में बुज़ुर्ग लोगों का चेतना-विकास करते जाना, बहुत बड़ा अर्थ रखता है।
क्योंकि उनकी यात्रा, युवा पीढ़ी के लोगों के लिए बड़ा सहारा और मार्गदर्शक चिह्न बनती है।
लगभग 1900 के दशक के बाद से पृथ्वी पर उतरे लोगों में, बहुत से ऐसे हैं जो मानवता का भविष्य खोलने वाले अग्रणी की भूमिका स्वेच्छा से माँगकर भौतिक लोक में उतरे।
यह ख़ास तौर पर 1940 से 1980 के दशक में जन्मे लोगों में केंद्रित है।
इसका अर्थ है कि आज के अधेड़ और बुज़ुर्ग लोग इसमें आते हैं, और इसीलिए, हम चाहते हैं कि उस पीढ़ी के लोग नकारात्मक स्मृतियों की कड़ी तोड़ें, चेतना के झूले पर एक ही झटके में छलाँग लगाकर, दिव्य क्षेत्र की दृष्टि से संसार को देख सकने वाले व्यक्ति में बदल जाएँ, और इसी सोच से, शायद थोड़ा कठोर लगे, पर सच्चा सत्य थोड़ा-थोड़ा करके बता रहे हैं।
सब एक साथ कह दें, तो वह बहुत ही कठोर होगा, और साथ चल सकने वाले सच में बहुत ही थोड़े, मुट्ठी भर लोग रह जाएँगे।
ऐसे बहुत से लोग हैं जो अंत में दिव्य मानवता के सत्य को प्रकट करके, पृथ्वी-लोक में अपने पुनर्जन्मों के संचय को पूर्णता देना चाहकर जन्मे हैं।

★अँधेरे संसार को रोशन करने वाली उजाले की किरणों के नाम
हम चाहते हैं कि ऐसे लोग जितने अधिक हो सकें, अपने जीवन के सत्य को याद करें, और जीवन में स्वस्थ और खुले होकर, धरती पर रहते हुए स्वर्ग के मन को प्रतिबिंबित करें और फैलाएँ।
स्वर्ग का अर्थ अपने से बहुत दूर, आकाश के उस पार वाली जगह नहीं है।
उसका अर्थ है तुम लोगों के मन की गहराई में स्थित जीवन का मूल निवास।
वह, भौतिक दृष्टि से देखो तो ब्रह्मांड के उस पार है, लेकिन जीवन की गहराई में खोजो, तो जीवन के मूल में भी है।
हम चाहते हैं कि ऐसा सत्य समझने वाले लोग जितने अधिक हो सकें प्रकट हों।
और, उन लोगों के अस्तित्व और जीने के ढंग के ज़रिए, आसपास के लोगों तक इसे खोलते जाएँ।
ऐसी बात को सुनी-सुनाई की तरह दूसरों से कह दो, तो अगर कहने वाला स्वयं सत्य को प्रकट करके न जी रहा हो, तो वह असली नहीं है, इसलिए सामने वाले तक केवल यह तथ्य पहुँचता है कि वह असली नहीं है, और केवल उथली छाप ही पड़ती है।
सत्य, व्यवहार में लाने पर ही आसपास पर अच्छा असर डालने वाली दिव्य शक्ति प्रकट करता है।
यह बात भूले बिना, पहले तुम स्वयं अपने चेतना-विकास को चरम तक ले जाओ।
तब तुम्हारी आभा किसी से न दबने वाला विशाल महान उजाला बनकर, आसपास के अँधेरे को रोशन करेगी, और लोगों को याद दिलाने वाली प्रभाव-शक्ति रखेगी कि सच्ची बात क्या थी।
तुम लोगों का अस्तित्व पहले ही अँधेरे संसार को रोशन करने वाली उजाले की एक किरण बन चुका है, लेकिन यह पहले भी और दूसरे भी, जीवन के प्रकाश का ही कमाल है।
भूलकर भी यह गलतफ़हमी मत पालना कि तुम महान हो।
एक कहावत है न, “धान की बाली जितनी पकती है, उतनी झुकती है।”
इसी तरह, जब सब अच्छा चल रहा हो तब और भी विनम्र रहकर, कभी उस शक्ति का दिखावा न करके रहना ही सच्ची दिव्य मानवता का ढंग है। (अगली बार जारी)






