स्वर्ग का जाल विशाल और ढीला है, फिर भी उससे कुछ नहीं छूटता (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
इसी नाम का पिछला लेख
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(पिछली बार से जारी)
★प्रकट हुआ हर भाग्य अद्भुत रूप से संतुलित है
ऐसी स्थिति को ही कहते हैं, “स्वर्ग का जाल विशाल और ढीला है, फिर भी उससे कुछ नहीं छूटता”।
मनुष्य का मन, केवल वह सतही चेतना नहीं जो तुम लोग सोचते हो।
उसके भीतर, परत-दर-परत एक-दूसरे पर चढ़ी अनेक भावनाएँ हैं।
इस तथ्य के बारे में सोचे बिना, जिसे “मैं, मैं” मानते हैं उस जाग्रत मन भर से, हाँफते-डूबते रहना ही भौतिक मनुष्य की असली तस्वीर है।
इसलिए तुम लोगों के संसार के पैमाने से कितना भी बड़ा और महान दिखने वाला व्यक्ति हो, और उल्टा, घर में भी न रह पाकर जीने वाला व्यक्ति हो, जीवन से देखें तो सब एक ही रास्ते पर चलने वाले साथी हैं।
भौतिक मनुष्यों का आपसी संसार, “तू तो बड़ा छोटा है” “हाँ? तू भी” जैसा है, और हम चाहते हैं कि तुम ध्यान दो कि ख़ुद की दूसरों से तुलना करके, ऊँच-नीच के लिए एक-दूसरे पर हावी होना कितनी बर्बादी है।
तो, पहली नज़र में असंबंधित दिखने वाले हर व्यक्ति के विचार, वचन और कर्म के समूह गहराई से जुड़े हैं, यह बात किससे तुलना करके समझाएँ तो आसान होगी……।
अहा, हाँ, हाँ, वह खाना पकाने जैसा है।
उदाहरण के लिए, कोई व्यंजन बनाते समय, सामग्री और मसालों के मेल के अनुसार, बहुत स्वादिष्ट व्यंजन बनता है, या वैसा नहीं बनता न।
जैसे सामग्रियों के अपने स्वाद और मसालों की मात्रा का मेल अद्भुत रूप से बैठने पर ही स्वादिष्ट व्यंजन बनता है, वैसे ही मनुष्यों के विचार, वचन और कर्म भी अद्भुत रूप से संतुलित होकर, हर एक दूसरे के कर्म को मिटाते, जीवित करते, चमकाते हुए, बहुत अच्छे ढंग से मिलाए गए हैं।

★आत्म-एकीकरण का सबसे आसान, सबसे अच्छा रास्ता
और इसे मानवीय बुद्धि से आँका नहीं जा सकता।
क्योंकि बहुत से लोग, पिछले जन्मों के विचार, वचन और कर्म और इस जन्म के भाग्य के बीच के कारण-परिणाम संबंध को कुछ भी जाने बिना, केवल अपनी आज की स्थिति से ही चीज़ों को देखते हैं न।
लेकिन इसके लिए, आत्मिक शक्ति वाले लोगों से उत्तर माँगने से बेहतर, और भी पक्का रास्ता है।
क्योंकि बाहर से सुनी बात, न चाहते हुए भी अधूरी कहानी बन जाती है।
बाहर से आने वाली सूचना में, समग्र के भीतर उसकी जगह आसानी से नहीं दिखती, इसलिए एकीकरण तक पहुँचने का संकेत, आख़िरकार तुम्हारे अपने भीतर है।
जब तक यह समझ न आए कि मनुष्य जीवन के स्रोत में सब एक ही जीवन वाले अस्तित्व हैं, तब तक कितना भी समय बीते, सापेक्ष धारणा के पिंजरे के भीतर से ही, संसार को देख पाते हैं।
इसलिए अंततः, अपने भीतर के बँटवारे को एक करके, सामंजस्य में लाने के सिवा कोई तरीका नहीं।
इसे आसानी से कर सकने का तरीका है, हमेशा की श्वास को गहरा करना।
दूसरों के प्रति महसूस होने वाली भावना को पलटकर, अपनी बात के रूप में देखो।
ऐसा करने से, मन का सामंजस्य पूरा होता है।
जब तक दूसरों की बात को पराई बात के रूप में देखते रहते हो, तब तक किसी भी बात में सत्य नहीं खोज पाते।
अति की बात कहें तो, जब तक हर एक मनुष्य के भीतर के मन के संसार की शांति न बन जाए, तब तक वह प्रकट संसार में प्रकट नहीं होती।
तुम लोग जिसे वास्तविकता मानकर देखते हो वह संसार, अपनी पहचान के दर्पण की तरह प्रतिबिंबित होने वाला संसार है।
वह पहचान भी, जैसा अभी कहा, आयामों की गहराई रखती है, सपाट नहीं।
कठिन है न।
इसलिए दिमाग़ से सोचने की ज़रूरत नहीं, जैसे जीवन का महान स्रोत करता है वैसे ही, धीमी, शांत श्वास लेकर, उस श्वास की ध्वनि में ख़ुद को सौंप दो, बस।
क्योंकि यही आत्म-एकीकरण का सबसे आसान, सबसे अच्छा रास्ता है। (समाप्त)






