मन की शांति स्थापित करें (उत्तरार्ध)
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(पिछली बार से जारी)
★मानवता बदले तो प्रकृति-जगत और जीव-जगत भी बदलते हैं
मानवता द्वारा गंदी की गई और घायल की गई प्रकृति और सारे जीवों को सामान्य अवस्था में लौटाने के लिए भी, पृथ्वी की मानवता के मन की शांति एक महत्वपूर्ण कुंजी है, यह भी याद रखना।
पृथ्वीवासी जीवन के सार को याद करके अपने जीने के ढंग पर फिर से नज़र डालते जाएँ, तो प्रकृति-जगत और जीव भी थोड़ा-थोड़ा चंगे होंगे, और पृथ्वी और भी रहने लायक तारा बनती जाएगी।
तुम लोगों में से हर एक के मन की शांति ही प्रकृति-जगत को मूल रूप में लौटाने की कुंजी है, और जीवों की सुख-शांति सुनिश्चित करने वाला महत्वपूर्ण तत्व है।
गंदी हुई हवा जी, पानी जी और टेढ़ी हुई धरती जी भी मूल सामान्य अवस्था बनाए रखने के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन मानवता द्वारा लगातार गंदे किए जाने से, उनकी स्वयं को शुद्ध करने की क्षमता कम हो गई है, और हाल में वे बड़े शुद्धिकरण वाले काम भी दिखाते हैं, है न।
भूकंप, तूफ़ान (हरिकेन), भीषण गर्मी-ठंड, तूफ़ानी बारिश-बर्फ़, सुनामी आदि को पूरी पृथ्वी की नज़र से देखो, तो उनमें एक पक्ष ऐसा भी है जैसे शरीर में गए ज़हर को निकालने के लिए बुख़ार आता है, यानी पृथ्वी का स्वयं ठीक होने का काम। लेकिन यह कभी भी पीड़ित हुए लोगों को दोष देने वाली घटना नहीं है। कष्ट में पड़े लोगों को, कृपया हृदय से सहानुभूति और प्रार्थना भेजो।
मानवता जीवन के सार को याद करती जाए, तो पृथ्वी को भी इतना बड़ा बुख़ार नहीं चढ़ाना पड़ेगा, इसलिए आओ सब मिलकर अब तक के रास्ते पर पीछे मुड़कर देखें, और इसी क्षण से अपने जीने के ढंग को कोमलता से फिर से सँवारें।
जानवरों के बारे में भी, मानवता दिव्य मानवता के रूप में जागती जाए, तो उनका ढंग भी पूरी तरह बदल जाएगा, और शेर और खरगोश मेल से साथ रहने जैसा, शांत आदर्श-लोक खुलेगा।

★पृथ्वी-लोक से सारे असामंजस्य को मिटाने के लिए
और, केवल मानवता की जनसंख्या की समस्या ही नहीं, यह सारे जीवों पर लागू होता है, किसी एक ख़ास प्रजाति का ही नाटकीय रूप से बढ़ जाना जैसी बातें भी, पृथ्वी की मानवता का चेतना-विकास आगे बढ़े तो रुक जाती हैं, और संसार ऐसा बनता है जिसमें उचित संख्या में ही जीव रहते हैं।
ऐसी बातें होना भी, किसी न किसी असंतुलन के पैदा होने के कारण होता है, और उस असंतुलन का कारण पूरी तरह मानवता से ही उत्पन्न होता है।
बस मानवता मन की शांति वापस पा ले, तो पृथ्वी-लोक से सारा असामंजस्य मिट जाएगा।
उसके लिए भी, गंभीरता से चेतना-विकास के लिए जीने का ढंग जारी रखो।
और समय हो तब, ध्यान से फिर से देखो।
पृथ्वी आज जैसा संसार क्यों बनी हुई है।
मानवता सब के सब खुशी से जीना चाहते हुए भी, यह क्यों पूरा नहीं कर पा रही।
इनके कारणों पर अच्छी तरह सोचो, तो पता चलता है कि सारे कारण मन के असामंजस्य में थे।
तब, जीने का ढंग सुधार लो, बस।
सब कुछ बेहतर बनाने के लिए भी। (समाप्त)






