बाहर भीतर है और भीतर बाहर है (2/8)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
★पृथ्वी को उन्नत सभ्यता वाले तारे के रूप में आगे बढ़ाने के लिए
तो, अगर हर किसी की व्यक्तिपरक धारणा वस्तुनिष्ठ घटना पर हूबहू चलकर सटीक रूप से पहचान पाती, तो ब्रह्मांड की समस्त सृष्टि को चेतना-स्तर की सीमा के भीतर वैसे का वैसा सही ढंग से समझा जा सकता, लेकिन अधिकांश मामलों में व्यक्तिपरक धारणा उस व्यक्ति के तरह-तरह के ज्ञान और धारणाओं से प्रभावित होकर आँखों में धूल झोंकी जा चुकी होती है, इसलिए बहुत से पृथ्वीवासी केवल सीमित, संकीर्ण संसार को ही पहचान पाते हैं।
मैं हमेशा कहता हूँ, किसी तारे के संसार का स्वरूप उस आकाश-धरती में रहने वाली मानवता रचती है, इसलिए उस तारे के लोगों की धारणा के अनुसार वह किसी भी संसार में बदल सकता है।
इसका अर्थ है कि अगर पृथ्वी के मनुष्यों की चेतना पूर्ण सामंजस्य में आ जाए, तो इस तारे का आकाश-धरती पूर्ण सामंजस्य वाला संसार बन जाएगा।
पृथ्वी को शांत तारा बनाने का “सबसे महत्वपूर्ण और सबसे बड़ा कारक” है “पृथ्वी की मानवता की चेतना,” और इसके अलावा पृथ्वी के भाग्य का नेतृत्व करने वाली कोई चीज़ नहीं है।
वास्तव में बहुत से दूसरे आयामों के अस्तित्व पृथ्वी-संसार के सबसे स्थूल स्पंदन वाले “चेतना के महा-प्रदर्शनी स्थल (भौतिक लोक)” पर काम कर रहे हैं, लेकिन उन कार्यों की वास्तविकता आखिरकार बस इतनी है कि वे “पृथ्वी को बेहतर बनाएँ” की चेतना रखने वाले तुम जैसे भौतिक पृथ्वी की मानवता के सहायक भर हैं।
बस भौतिक पृथ्वी की मानवता की चेतना जीवन के मूल प्रेम के प्रति जाग जाए, तो यह तारा सब कुछ के सामंजस्य वाली उन्नत सभ्यता रखने वाले दिव्य ग्रह के रूप में ब्रह्मांडीय समाज में घुल-मिल जाएगा, और दूसरे तारों से सीखने के ज़रिए और भी उन्नत सभ्यता वाले तारे के रूप में आगे बढ़ने का युग आएगा।

आज की पृथ्वी पर, व्यक्ति ने “संसार अमुक चीज़ है” जिस दायरे में समझा है, उसके अलावा भी इस ब्रह्मांड में वास्तव में अनजाने संसार व्यापक रूप से मौजूद हैं, फिर भी वह केवल अपने मानने के दायरे में ही ब्रह्मांड को पहचान पाता है, और इस वैज्ञानिक तथ्य के कारण कि “मनुष्य जिस आयाम-स्तर को पहचान सकता है वह उसकी चेतना के विकास की मात्रा के अनुरूप स्पंदन-क्षेत्र है, और मनुष्य केवल अपने साथ प्रतिध्वनित और अनुनादित स्पंदन को ही पहचान सकता है,”
- “यह दुनिया” कहलाने वाला संसार
- सूक्ष्म लोक का स्पंदन-क्षेत्र (अवचेतन की परत)
- शरीर का जीवन अनुभव कर चुके मनुष्यों में, जिनकी मृत्यु के समय की चेतना गहरे भ्रम में थी, उनके द्वारा मृत्यु के बाद विचारों से रचा गया संसार
इन तीन स्पंदन-क्षेत्रों के आसपास तक ही प्रतिक्रिया कर पाने वाले लोग बहुत हैं।
यहाँ, “एक बात से सब बातें” की गलतफ़हमी न हो इसलिए जोड़ दूँ कि तुम जैसे चेतना के विकास की चाह वाली मनःस्थिति में जीने वाले लोगों में भी कुछ ऐसे हैं जो केवल अभी बताए तीन स्पंदन-क्षेत्रों तक ही जुड़े हैं, लेकिन आत्मिक लोक के निचले या मध्य भाग तक जुड़े लोग बहुत हैं।
और समग्र में से बहुत थोड़े लोग आत्मिक लोक के ऊपरी भाग में या पहले ही दिव्य क्षेत्र के स्पंदन-क्षेत्र में प्रवेश करके जी रहे हैं।
तो, बात को थोड़ा पीछे ले जाएँ, अभी बताए बहुत से पृथ्वीवासियों के प्रतिक्रिया करने वाले तीन संसारों में से तीसरा संसार मूल रूप से ब्रह्मांड के हृदय और उसके अंश-मन द्वारा रचित स्थान नहीं है, बल्कि नरक, अंधकार-लोक, अविद्या-स्पंदन-क्षेत्र आदि कहलाने वाला मानव-निर्मित स्पंदन-आकाश-धरती है।
तो “ब्रह्मांड के हृदय का अंश-मन न होने वाला अस्तित्व क्या है” सोचने वालों के लिए उत्तर दूँ, तो वह है पृथ्वी की मानवता में बहुतों का अपने सार को भूलकर “शरीर ही मनुष्य है” की भूल करने वाला विचार।
इस तरह, मनुष्यों द्वारा अपने सार को न जानकर विचारों के गलत उपयोग से रचा गया संसार ही अभी बताया तीसरा संसार है, “शरीर का जीवन अनुभव कर चुके मनुष्यों में, जिनकी जीवित रहते या मृत्यु के समय की चेतना गहरे भ्रम में थी, उनके द्वारा मृत्यु के बाद विचारों से रचा गया संसार।”
और जब अभी शरीर में रहने वाले लोग असामंजस्यपूर्ण विचार, वचन और कर्म में उलझे रहते हैं, तब उनकी अपनी चेतना उन स्पंदन-क्षेत्रों के अनुरूप हो जाने के कारण वे एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं और आसानी से न निकल पाने वाले दुःख में रहते हैं, ऐसी स्थिति है। (अगली बार जारी)






