पृथ्वी-जगत में दिव्यता के पुनर्जागरण की लहर को ऊँचा उठाने के लिए
प्रकाशित अद्यतन
★एक व्यक्ति का उद्धार हो तो हज़ारों लोगों का उद्धार होता है, यह सिद्धांत
संसार में केवल एक, तुम, जब सच्चा उद्धार पाते हो, तो तुमसे जुड़े दसियों हज़ार, लाखों, दसियों लाख लोगों के लिए उद्धार का मार्ग खोलते हो।
आज संक्षेप में बताता हूँ कि एक व्यक्ति के सच में आत्मा का उद्धार पा लेने पर, बाकी बहुत से लोगों का उद्धार क्यों तय हो जाता है।
पूरी दुनिया पर नज़र डालो।
सचमुच तरह-तरह के लोग जी रहे हैं, है न।
उनमें से हर एक को देखो, तो हर किसी के बिल्कुल अलग पिछले जन्म हैं, और उनमें से बहुत से लोग कई व्यक्तियों के पिछले जन्म एक साथ रखने वाली मिश्रित आत्माएँ हैं, यह दिखता है।
इस तरह, बिल्कुल अलग स्वभाव वाले लोगों को भी, स्वभाव, व्यक्तित्व, विचार-आदतों के रुझान आदि के आधार पर वर्गीकृत करके देखो, तो कुछ हद तक समूहों में बाँटकर देखा जा सकता है।
उदाहरण के लिए, ईर्ष्यालु स्वभाव वाले लोग, शक्की स्वभाव वाले लोग, आशावादी स्वभाव वाले लोग, आगे बढ़ने वाली दृढ़ इच्छा के रुझान वाले लोग, इस तरह।
गिनाने लगो तो अंत नहीं, इसलिए सब नहीं कहता, लेकिन ऐसे वर्गीकरण के भीतर, जब अकेले तुम सच्चा उद्धार पाते हो, तो तुमसे मिलते-जुलते स्पंदन वाली संसार की मानवता को, आत्मा के सच्चे उद्धार तक पहुँचने का मार्ग देते हो।
किसी और के लिए कहकर बड़ा बनने की ज़रूरत नहीं, जब तुम अपनी चेतना के विकास की ओर उन्मुख होकर, खुद को निखारते और गहरा करते, ऊँचा उठाते और फैलाते हो, तब तुमसे मिलते-जुलते स्वभाव वाली मानवता के लिए उद्धार का मार्ग खोलते हो।

★बाहर का ब्रह्मांड भीतर के ब्रह्मांड का प्रक्षेपण है
इसलिए तुम्हें दूसरों के साथ कुछ करने की सोचने की ज़रूरत नहीं।
क्योंकि तुम चमको, तो दूसरे भी चमकते हैं।
ऐसा क्यों होता है?
हाँ, अच्छा प्रश्न है।
यह ब्रह्मांड और मानवता के संबंध को खोलकर देखो तो समझ आता है, तुम जो संसार देख रहे हो, वह असल में तुम्हारे मन में फैले भीतर के ब्रह्मांड का प्रक्षेपण है।
तुम लोग जो यथार्थ संसार देख रहे हो, उसे बाहर का ब्रह्मांड मानें, तो वह तुम्हारे मन के भीतर वाले ब्रह्मांड में घट रही बातों का प्रतिबिंब है।
इसलिए अकेले तुम जीवन में निहित दिव्यता का बोध पाकर उसे प्रकट करते हुए जियो, इतने से भी, तुमसे संयोग रखने वाली पृथ्वी की मानवता सार्वभौमिक सत्य के प्रति जागने की ओर ले जाई जाती है, यही बात है।
इसीलिए कहता हूँ, “दूसरों को बदलने की कोशिश व्यर्थ का विरोध है, खुद न बदलो तो अपना देखा हुआ संसार नहीं बदलता”।
अपने और दूसरों की आलोचना, निंदा और मूल्यांकन, कुछ भी उत्पादक परिणाम नहीं लाते।
क्योंकि जब तक निर्णय सुना रहे होते हो, तब तक खुद भी और दूसरे भी, उसी पीड़ा भरी लहर में ठहरे रह जाते हैं।
जिन्हें यह सार्वभौमिक सत्य समझ आ गया, वे एक-एक करके, सब कुछ मुझ पर निर्भर है, यह मानकर, भीतर के ब्रह्मांड को सामंजस्य में लाने का प्रयास करें, यही चाहता हूँ।
क्योंकि ऐसे लोग जितने बढ़ेंगे, पृथ्वी की मानवता के दिव्यता के पुनर्जागरण की लहर उतनी ऊँची उठती जाएगी।






