जीते-जी नए जन्म का अनुभव करने के लिए-3
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
पृथ्वी-संसार की पूर्णता का महान मंच
दिव्यता से अभिव्यक्त किया गया जीवन का तात्कालिक अभिनय (पल भर के निर्णय से किए वचन और कर्म), तुम्हारे भाग्य को चटकीले रंग देगा, और पिछले जन्मों की विचार-आदतों से बनाई गई पटकथा को आसानी से पार कर देने वाला अभिनय बाहर लाएगा।
और तुममें मूल रूप से मौजूद वे पवित्र विचार, शब्द और कर्म, सब सहायक भूमिकाओं वाले लोगों की दिव्यता को भी बाहर लाने की शक्ति रखते हैं।
तुम लोगों का ऐसा जोशीला अभिनय ज़रूर पृथ्वी को एक निश्चित चरण तक ऊपर उठाएगा, और पूर्ण शांति साकार करेगा।
वह सब दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देने वाला होगा, और ज़बरदस्त तालियों के साथ कलाकारों को फिर से मंच पर बुलाया जाएगा।
“पृथ्वी-संसार की पूर्णता का महान मंच” सफलता से पूरा कर लो, तो तुम लोग उस पुकार का उत्तर देने मंच पर खड़े होगे, वह समय आएगा।
उस समय बेकार की हीन-भावना मिट चुकी होगी, इसलिए भरपूर सीना तानकर, गर्व के साथ उत्तर देना।
तुम लोगों के नाम पृथ्वी के इतिहास में अंकित होंगे, और अनंत काल तक उनका गुणगान होगा।
और उस सम्मान को हृदय में लेकर, तुम अगले ग्रह के विकास के लिए निकल पड़ोगे।
“अचानक ऐसी बात क्यों?” पूछते हो?
हाँ, ऐसी बात करने का कारण यह है कि यह बात “तुम लोगों के आगे अनुभव करने वाले निकट भविष्य की बात” होने के साथ ही, ऐसी बात भी है जिसका तुम लोग पृथ्वी पर आने से पहले ही कई बार अनुभव कर चुके हो।

नया जन्म पा चुके तुम
अनेक ग्रहों को पूर्णता तक ले जा चुकी उस कुशलता को भरपूर प्रकट करने का समय आख़िरकार आ गया है।
तुम जीते-जी नया जन्म पा चुकी दिव्य मानवता के रूप में, नई पृथ्वी की सभ्यता के लिए ज़रूरी मानवीयता सारी मानवता को दिखाओगे।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मुँह से झाग उड़ाते हुए, सड़क पर भाषण देने की तरह लोगों पर बदलाव थोपो।
न यह कि अपनी मान्यताओं वाले विचार आसपास के लोगों पर लादो।
बस पृथ्वी के एक नागरिक के रूप में, एक साधारण आम व्यक्ति के रूप में, समाज के किसी कोने में अब तक की तरह सामान्य रूप से जीते रहो, इतना ही काफ़ी है।
चेतना के विकास की ओर उन्मुख लोगों में कुछ ऐसे भी हैं जो पहले ही सार्वभौमिक सत्य के प्रति जागकर नया जन्म अनुभव कर चुके हैं, लेकिन जिन्होंने अभी अनुभव नहीं किया, वे भी बहुत दूर नहीं ऐसे भविष्य में इसका अनुभव करेंगे।
सुनो, इसका अर्थ है अब तक की स्मृतियों को वैसे ही रखते हुए, स्मृतियों में न उलझने वाला व्यक्ति बनना।
स्मृतियों में अटककर उन्हीं के आधार पर विचारों का उपयोग करते आए, इसीलिए कितना भी समय बीते, गोल-गोल चक्कर की तरह अनंत प्रज्ञा को सक्रिय नहीं कर पाए, बस इतना ही।
अतीत के मनुष्यों के सामान्य ज्ञान के आधार पर “अपने जीवन के प्रकाश की अभिव्यक्ति” को नियंत्रित करते रहे, इसीलिए हर बात में “असंभव, नहीं, नहीं कर सकता!” कहकर खुद को सीमित करते आए।
लेकिन अब ऐसे दिनों से हमेशा के लिए विदा (बाय-बाय) लेने का समय निकट आ रहा है।
तुम्हारे मन में, तुम्हारी चेतना में, तुम्हारे विचारों में, तारों को पूर्णता तक ले जाने की स्मृतियाँ फिर से जाग उठेंगी।
और “ऐसा करूँ”, “ऐसा करना चाहता हूँ”, “ऐसा होना चाहता हूँ”, जो सोचा उसे यथार्थ बनाने वाली कर्म-शक्ति प्रकट कर सको, ऐसे बदल जाओगे।
“पहले का मैं ऐसा सोच ही नहीं पाता था। पर अब अलग है। भीतर से अनंत शक्ति उमड़ रही है, और मैं कुछ भी यथार्थ बना सकता हूँ!”
जब ऐसा लगे, तब तक तुम पहले ही नया जन्म पा चुके होते हो।
(अगली बार जारी)






