चेतना का स्वतंत्रता से उपयोग कर सकने के लिए
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★ फ़ुटबॉल विश्व कप में जापान की पुरुष राष्ट्रीय टीम के विकास में दिखता चेतना के उपयोग का सही ढंग
कल का मैच भले हार गए, लेकिन फ़ुटबॉल विश्व कप में जापान की पुरुष राष्ट्रीय टीम “अपनी तरह का फ़ुटबॉल” खेलना ही है, इस बंधन, या कहें जकड़न से मुक्त होकर, प्रतिद्वंद्वी के अनुसार स्वतंत्र रूप से रणनीति अपनाने लगी है, या पहले ही ऐसा कर चुकी है, इस तरह की बातें कई जगह हो रही थीं, है न।
यह केवल फ़ुटबॉल ही नहीं, पूरे जीवन में व्यक्तित्व के निर्माण और चेतना के विकास के मार्ग पर भी लागू करके काम में लाई जा सकने वाली बात है।
उदाहरण के लिए, होंडा खिलाड़ी की बात बहुत सारगर्भित और रोचक थी, है न।
“2014 की तुलना में जो साफ़ फ़र्क है, वह शायद यह है कि ‘हम पहले’ से ‘प्रतिद्वंद्वी पहले’ (की ओर बदलाव) हुआ, या कहें कि फ़ुटबॉल के सार के प्रति सोच और मूल्य बदले हैं”
“यह पत्थर-कागज़-कैंची जैसा है, जब पता है कि (प्रतिद्वंद्वी) कैंची निकालेगा, तो कागज़ पर अड़े रहने की क्या ज़रूरत, बात बस इतनी-सी है”
उनके इन शब्दों को जीवन पर लागू करें, तो इसका अर्थ है, “अपने स्थिर ढर्रे और विचारों की आदतों से खुद को मुक्त करके स्वतंत्र हो जाओ, तो समय, स्थान और व्यक्ति के अनुसार उचित विचार, वचन और आचरण का स्वतंत्र प्रयोग करके, हर समय महान सामंजस्य उत्पन्न करना संभव हो जाता है”, और तुम अच्छे विचारों की ज़िद से भी खुद को मुक्त करके, और बड़े कार्य में लग सकने वाली मनोदशा तक एक कदम ऊपर उठ सकते हो।
ठोस रूप से कहें तो, “ऐसा ही करना चाहिए”, “ऐसा ही होना चाहिए”, “ऐसा करना ही उचित है” जैसी, विश्वास समझ ली जाने वाली आसक्तियों के प्रति अपने बोध को गहरा करना।
इस तरह के विचार, लोगों के साथ संबंधों के बीच देखो तो, अपनी चेतना को सौ कदम, हज़ार कदम पीछे हटकर देखो तो, अपने आप से “अरे, ऐसी बात पर अड़ने की क्या ज़रूरत है” कहते हुए, सहज मन से देख सकते हो, है न।

★खुद से पूछो कि तुम जीवन में अपने ढर्रे और ज़िद को कितने लचीलेपन से चला रहे हो
तो जब सचमुच वैसी स्थिति आए, तब अड़े न रहने को अमल में लाकर देखो।
अपेक्षा से कहीं आसानी से काम बन जाता है……
जीवन-ढंग और वचन-कर्म में भी, अगर अपने पैटर्न और ढर्रे में दूसरों को भी ढालने की कोशिश करते हुए “ऐसा ही होना चाहिए” कहकर अपनी बात थोपते रहो, तो सामने वाला भी “कितना अड़ियल आदमी है” सोचकर ऊब जाता है, और समय, स्थान और लोगों का संयोग मिलकर बात आगे बढ़ने का जो सुनहरा अवसर आया था, उसे बेकार करके आँखों देखे गँवा देने जैसा भी होता है।
यह पहले बताई गई बात “ढाँचे से प्रवेश करो और ढाँचे से बाहर निकलो” की “ढाँचे से बाहर निकली अवस्था” है।
हर कोई युवावस्था में जीवन की बुनियादी बातें (सार्वभौमिक सत्य) पूरी तरह ठीक से आत्मसात कर ले, तो जब वह असली समाज नाम के अभ्यास-क्षेत्र में उतरता है, तब किसी भी व्यक्ति के वचन-कर्म और सब घटनाओं का सामना कर सकने वाला मौलिक जीवन जी सकता है।
व्यवहार में देखें तो बहुत से वयस्कों को युवावस्था में जीवन की बुनियादी बातें सीखने का अवसर नहीं मिला, इसलिए उम्रदराज़ लोग भी अचानक अप्रत्याशित स्थिति आने पर उलझन में पड़ जाते हैं, यह समाज में अक्सर देखा जाता है।
लेकिन जीवन में कभी भी देर नहीं होती।
यह बात तो ज़ोर से कहता हूँ।
किसी भी बात में “लगन” रखने वाले के लिए समय ज़रूर इंतज़ार करता है।
“मैं ऐसा बनना चाहता हूँ, बनकर दिखाऊँगा”, यह एकचित्त होकर दृढ़ निश्चय करके, साहस के साथ आगे बढ़ते जाओ, तो पाँच साल, दस साल, या उससे भी लंबी अवधि में देखो तो, तुम ज़रूर वैसे बन चुके होते हो।
आजकल बहुत से लोग तुरंत परिणाम मिलने के आदी हैं, इसलिए बात तुरंत मनचाही न बने तो मन उचट भी जाता है, लेकिन जीवन खेल की तरह रीसेट करने की चीज़ नहीं, और समय लगाकर धीरज से, इत्मीनान से जुटे रहो, तो ज़रूर वह बन सकते हो जो बनना चाहते हो।
झूठ लगे तो करके देखो।
बस धीरज से।
और फिर दस साल बाद के अपने आप को देखना।
ज़रूर वैसे बन चुके होगे।
बशर्ते तुम उसमें पूरी गंभीरता से जुटे रहो।







